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पंजाब में मजदूरों का बढ़ने लगा संकट -लॉकडाउन और कर्फ्यू के चलते अपने घरों को वापस जाने लगे प्रवासी

चंडीगढ़:- एक बार फिर से पंजाब में मजदूरों का संकट बढ़ने लगा है। कोरोना के बढ़ने के बाद लॉकडाउन और कर्फ्यू के भय से उत्तरप्रदेश, बिहार और राजस्थान से आये मजदूर अपने राज्यों को लौटने लगे हैं। गेहूं कटाई के लिए ये मजदूर पंजाब आये थे और धान की रोपाई भी ये ही मजदूर करते हैं लेकिन कोरोना के भय ने इन प्रवासी मजदूरों को अपने घर वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया है जिससे धान की रोपाई अधर में लटक गई है। वैसे भी किसान आंदोलन में हैं और खेतों में काम ये मजदूर ही करते हैं
जानकारी अनुसार राज्य में गेहूं और धान के सीजन में मंडियों में आठ लाख से अधिक मजदूर कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त पंजाब में लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर उद्योगों में कार्यरत हैं। पिछले वर्ष पंजाब में कोरोना संकट में लॉकडाउन और कर्फ्यू के बाद राज्य से लाखों मजदूर वापस उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान लौट गए थे। तब भी मजदूरों का संकट बढ़ा था और पंजाब सरकार ने ज़िला डिप्टी कमिश्नरों के मार्फ़त मनरेगा मजदूरों की सूचियां मांग ली थी ताकि प्रवासी मजदूरों के अभाव में मनरेगा मजदूरों से काम लिया जा सके। हालांकि मनरेगा मजदूरों से धान की रोपाई का कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ था।
राज्य में करीब आठ लाख लोग करते हैं मजदूरी-
पंजाब में गेहूं अथवा धान का सीजन में करीब आठ लाख लोग मजदूरी पर लगते हैं। पंजाब के मालवा क्षेत्र के दो -तीन ज़िलों मुक्तसर, फाजिल्का, फरीदकोट और बठिंडा के कुछ क्षेत्रों में मजदूर स्थानीय और कहीं-कहीं राजस्थान से बुलवाये जाते हैं लेकिन अन्य स्थानों पर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश से बुलवाए जाते हैं। गेहूं के सीजन के समय 25 मार्च के आस पास आढ़ती ठेकेदारों के माध्यम से बिहार और उत्तर प्रदेश से मजदूरों की बुकिंग कर लेते हैं। राज्य के मालवा क्षेत्र के कुछ ज़िलों में जहाँ गेंहू पहले आ जाता है, वहां मजदूर पहले अप्रैल के पहले -दूसरे सप्ताह में आते हैं और अन्य स्थानों पर अप्रैल के दूसरे सप्ताह के बाद आने शुरू होते हैं।
पंजाब के 22000 से अधिक आढ़तियों में एक -एक के पास अनेक मंडियों में खरीद का कार्य होता है। ऐसे में एक -एक आढ़ती के पास 20 से लेकर 40 मजदूर तक होते हैं। ये मजदूर किसानों की जिस तो ट्राली से उतरते हैं, उसकी सफाई करते हैं। फसल को तय वजन के मुताबिक बोरियों में भरते हैं, सिलाई करते हैं और फिर गोदामों में भेजने के लिए उनकी वाहनों में ढुलाई भी करते हैं। यही मजदूर मई के अंत अथवा जून में गेहूं के कार्य से मुक्त होने के बाद पंजाब में धान की रोपाई के कार्य पर लग जाते हैं।
30 हजार मजदूर जा चुके हैं वापस-
इसके कारण अब स्थिति चिंताजनक बनती जा रही है। मजदूरों के लौटने का असर पंजाब के उद्योगों पर पड़ने लगा है। पंजाब की औद्योगिक नगरी लुधियाना में इसका असर देखने को मिल रहा है। हालांकि संख्या को लेकर कोई पुष्टि तो नहीं लेकिन करीब 30 हज़ार मजदूर इसी भय के चलते वापस जा चुके हैं और इसका सिलसिला जारी है।
मजदूरों के पलायन से उद्योगों पर पड़ा असर-
राज्य की स्थिति फिर से बदलने लगी है। इसका सबसे पहला असर पंजाब के उद्योगों पर पड़ा है। पिछली बार लॉकडाउन के दौरान मजदूरों के लौटने से आर्थिक नुकसान और परेशानी सहनी पड़ी थी। इसी डर के चलते अब दोबारा से राज्य वैसी स्थिति देखने के मूड में नहीं है। पंजाब में फिलहाल अधिकतर रेल गाड़ियां बंद हैं। ये मजदूर बसों से वापस जा रहे हैं। लुधियाना से वापस आ रहे मजदूर परिवार रामदीन का कहना था कि पिछली बार जो पंजाब से कमाया था, वह वापस जाने में ही खर्च हो गया। कोरोना संकट के बढ़ने की उम्मीद नहीं थी लेकिन एकदम संकट बढ़ा तो अब मजदूरों में चिंता फिर से बढ़ गई है। दूसरी और फेडरेशन ऑफ़ आढ़ती एसोसिएशन ऑफ़ पंजाब के अध्यक्ष विजय कालड़ा की राय अलग थी। उनका कहना था कि मजदूरों का अधिकतर पलायन उद्योगों से हो रहा है जबकि ठेकेदारों के मार्फ़त फसलों के लिए आये मजदूर तो ठेकेदारों की निगरानी में हैं और जिन ठेकेदारों ने मजदूरों को राशि दी है, उन्होंने ही मजदूरों को संभाला हुआ है। चंद दिन पहले आढ़तियों के साथ हुई मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की बैठक में भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी। इसके बावजूद पंजाब के किसानों, उद्योगपतियों, व्यापारियों और सरकार के लिए यह मुश्किल आसान नहीं हुई है।

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