May 7, 2021

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अक्षत सुहाग के लिए महिलाओं ने रखा निर्जला व्रत, कर रही हैं गौरी-शंकर की पूजा

बेगूसराय:- अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना का निर्जला व्रत तीज शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि शुक्रवार को मनाए जा रहे तीज करने 24 घंटे का निर्जला व्रत कर रही महिलाएं सुबह से ही सोलहों श्रृंगार से सजकर गौरी- शंकर की पूजा -अर्चना में लगी हुई हैं। लॉकडाउन के कारण मंदिर बंद रहने से इस वर्ष शिवालयों में भीड़़ नहीं है। महिलाएं घर पर ही शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर विधिवत पूजन कर रही हैं। सुहागन महिलाओंं के लिए यह एक ऐसा व्रत है जिसमें श्रृंगार समेत सभी पूजन सामग्री मां एवं सासू मां की ओर से दिया जाता है तथा इसी से पूजा होती है। मान्यता है कि कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर के लिए यह व्रत करती हैंं जबकि सुहागन महिलाएं अपने अक्षत सुहाग की कामना के लिए व्रत रखती हैं। कहते हैं कि एक बार व्रत रखने के बाद इसे जीवनभर रखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार तीज व्रत में कथा का विशेष महत्व होता है। कथा के बिना इस व्रत को अधूरा माना जाता है। इसलिए हरितालिका तीज व्रत रखने वाले को कथा जरूर सुननी या पढ़नी चाहिए। सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार हिमवान की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए बाल काल में हिमालय पर्वत पर अन्न त्याग कर घोर तपस्या शुरू कर दी थी। इस बात से पार्वती जी के माता-पिता काफी परेशान थे। तभी एक दिन नारद जी राजा हिमवान के पास पार्वती जी के लिए भगवान विष्णु की ओर से विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे। माता पार्वती ने यह शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। पार्वती जी ने अपनी एक सहेली से कहा कि वह सिर्फ भोलेनाथ को ही पति के रूप में स्वीकार करेंगी। सखी की सलाह पर पार्वती जी ने घने वन में एक गुफा में भगवान शिव की आराधना की। आराधना के दौरान भाद्रपद की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि के दिन हस्त नक्षत्र में पार्वती ने मिट्टी से शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजा की और रातभर जागरण किया। माता पार्वती के तप से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था और तभी से तीज की परंपरा चल रही है।

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