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सूर्य षष्ठी पर हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा में लगाई आस्था की डुबकी, दान पुण्य


वाराणसी:- भादों महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (सूर्य षष्ठी)लोलार्क छठ पर रविवार को हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा नदी में संतान सुख और प्राप्ति की चाह में आस्था की डुबकी लगाई। पर्व पर भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में स्नान पर लगे रोक और मेले के स्थगित होने से निराश श्रद्धालु निसंतान दम्पति भोर से ही दशाश्वमेधघाट, अस्सीघाट, तुलसीघाट, सामनेघाट गंगा स्थान के लिए उमड़ने लगे। गंगाघाटों पर स्नानार्थियों के भीड़ से मेले जैसा नजारा रहा। लोग कोरोना प्रोटोकाल का उल्लंघन कर लगातार गंगा स्नान के लिए पहुंचते रहे।
कोरोना संक्रमण के मद्देनजर प्रशासन-पुलिस और मेला समिति की बैठक में लोलार्क कुंड पर लगने वाला मेला और स्नान को इस वर्ष भी स्थगित कर दिया गया। कुंड पर स्नानार्थियों की भीड़ न आये इसके लिए आधी रात के बाद से ही भेलूपुर एसीपी प्रवीण सिंह और अन्य पुलिस अफसर फोर्स के साथ वहां डट गये। रोक के बावजूद स्नान के लिए आने वाली महिलाओं को पुलिस कर्मी समझा बुझा कर वापस भेजते रहे। कुंड से वापस लौटने वाली महिलाएं और दम्पति तुलसीघाट और अस्सीघाट पहुंच कर गंगा में स्नान करते रहे।
बताते चले,काशी के लक्खा मेलों में शुमार लोलार्क पष्ठी स्नान की मान्यता है कि संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाले दंपतियों की मनोकामना लोलार्केश्वर महादेव पूरी कर देते हैं। इसलिए हर साल कुंड में स्नान करने के लिए देश के अलग-अलग क्षेत्रों से श्रद्धालुओं की यहां भारी भीड़ जुटती है। लोलार्क कुंड को सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है। भाद्रपद्र के शुक्ल पक्ष की षष्ठी वाले दिन कुंड से लगे कूप से पानी आता है। सूर्य की रोशनी के पानी में पड़ने से संतान उत्पत्ति का योग बनता है। मान्यता है कि इस दौरान महिलाओं के स्नान करने से उन्हें संतान प्राप्त होती हैं। संन्यासी लोग भी यहां मोक्ष के लिए स्नान करते हैं। स्नान करने के बाद दंपती कुंड पर अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ देते हैं। कुंड में एक ऐसा फल भी छोड़ा जाता है जो संतान का प्रतीक माना जाता है। उक्त फल का सेवन दम्पती जीवन पर्यंत नहीं करते। मनौती पूर्ति होने पर लोग गाजे-बाजे के साथ अपने बच्चे को लेकर आते है और कुंड में स्नान के बाद लोलार्केश्वर महादेव की पूजा कर उनके प्रति कृतज्ञता जताते हैं।

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