May 8, 2021

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

पंचाक्षर नमः शिवाय और ऊँ में कोई भेद नहीं है और यह शिव का प्राण मंत्र है : हरीन्द्रानन्द जी

मनातू:- जगत की उत्पत्ति के पूर्व महाशून्य था। शिव अपनी शक्ति के साथ अव्यक्त अवस्था मे अवस्थित थे। शिव के अंदर इच्छा का आविर्भाव हुआ – एकोअहम बहुस्याम अर्थात मैं एक हूँ अनेक हो जाऊं।इस इच्छा के प्रकट होते ही शिव और शक्ति की संयुक्त सत्ता से इच्छा का अस्तित्व हुआ। अव्यक्त शक्ति अब व्यक्त हुई। शक्ति सत्ता का प्रकटीकरण इच्छा के रूप में हुआ। इच्छा तरंग रूप में थी। उस महेश्वर की इच्छा से महाशून्य में एक तरंग उत्पन्न हुई। विदित है कि इच्छा में तरंग होती है। इच्छा की इन तरंगों में शब्द रहित अंतर्निहित सृष्टि की इच्छा थी। स्वाभाविक रूप से सृष्टि की इच्छा में पालन और लय समाहित थे। ध्वनि तरंगों से ऊँ जैसी ध्वनि प्रकट हुई। ऊँ में तीन अक्षर हैं – अ, उ, म। ‘अ’ सृष्टि की उत्पत्ति, ‘उ’ सृष्टि का पालन और ‘म’ सृष्टि के लय की शब्दरहित ध्वनि है। माना जता है कि ऊँ शिव शक्ति संयुक्त सत्ता की उस समय की ध्वनि तरंगें हैं जब पांच तत्व और तीन गुणों का निर्माण नही हुआ था और सृष्टि अमूर्त थी। कहा जाता है कि अमूर्त शिव शक्ति सत्ता का ऊँ सृष्टि के मूर्त होते ही नमः शिवाय हो गया इसीलिये इसे शिव का प्राण मंत्र कहा जाता है।

साभार” आओ चलें शिव की ओर ” पुस्तक से

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