April 14, 2021

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1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भारत छोड़ों आंदोलन की नींव पड़ी

नेताजी ने पकड़ी अलग राह दामोदर नदी के किनारे जंगलों की झुरमुट को साफ कर बना था अधिवेशन स्थल, आंधी-पानी से पड़ा व्यावधान

रांची:- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का महत्वपूर्ण अधिवेशन 18 से 20 मार्च तक 1940 में रामगढ़ में हुआ था। दामोदर नदी के किनारे जंगलों की झुरमुट में सैकड़ों पंडाल लगाए गए थे। इस ऐतिहासिक तीन दिवसीय अधिवेशन में ही अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन की नींव पड़ा और रामगढ़ की धरती से ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अलग राह पकड़ ली और उन्होंने समानांतर अधिवेशन की।

बापू, नेहरू, पटेल,राजेंद्र प्रसाद समेत तमाम बड़े नेता शामिल हुए

मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में हुई रामगढ़ अधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ0 श्रीकृष्ण सिंह, डॉ0 राजेंद्र प्रसाद समेत देशभर के तमाम बड़े नेताओं हिस्सा लिया। इस मौके पर बापू ने अधिवेशन स्थल पर लगायी गयी एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया और महिलाओं से पर्दा प्रथा, छूआछूत, अशिक्षा, अंधविश्वास जैसी कुरीतियों से जेहाद करने की अपील की थी।

राजेंद्र प्रसाद के प्रयास से रामगढ़ में हुआ अधिवेशन

रामगढ़ में तैयारी के पहले पार्टी की ओर से कई अन्य स्थानों पर अधिवेशन करने का विचार किया गया। लेकिन रामनारायण सिंह की इच्छा और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रयास से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 53वां महाअधिवेशन रामगढ़ में ही दामोदर नदी के तट पर कराने का निर्णय लिया गया। तब राजा रामगढ़ ने इसे सफल बनाने में तन-मन-धन से सहयोग दिया था।

सिख रेजीमेंट छावनी परिषद में है अधिवेशन स्मारक स्थल

रामगढ़-बरकाकाना मार्ग स्थित दामोदर नदी की उपनदी हरहरि नदी किनारे 1940 में जिस स्थान पर रामगढ़ अधिवेशन अधिवेशन हुआ था, वह स्थान आज सिख रेजीमेंट छावनी परिषद के अंदर चला गया। आज भी अधिवेशन की याद में वहां एक स्मारक बना है। महाधिवेशन को लेकर तब कांग्रेस के स्वयंसेवकों ने बड़ी मेहनत से जंगल में झाड़ियों और झुरमुट को साफ कर पार्टी नेताओं के लिए पंडाल बनाये थे। अधिवेशन में भाग लेने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं के लिए बांस-बल्ली से तंबू का निर्माण किया गया था। आजादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे इन नेताओं को देखने के लिए तब सम्मेलन स्थल पर गांव-गांव से लोगों की अपार भीड़ जुटी थी। मूसलाधार बारिश के बावजूद हजारों की संख्या में लोग डटे रहे थे। बताया जाता है कि महाअधिवेशन के दौरान गांधी जी ने आजादी के लिए जैसे ही सभी लोगों से आह्वान किया , पूरा समारोह स्थल आजादी के नारों से गूंजने लगा था।

टाना भगतों ने सूत काटा, उमड़ी भीड़

टाना भगतों ने अधिवेशन के दौरान चरखा चलाकर सूत भी काता था। आस-पास के गांवों से किसानों, मजदूरों, पुरुष-महिलाओं व युवाओं का हुजूम अधिवेशन में भाग लेने के लिए उमड़ पड़ा था। उस वक्त खराब मौसम भी आजादी के सपने देखने वालों के कदम को रोक नहीं पाया था। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोग रामगढ में जुटे थे। अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद कर रहे थे।

पुष्पवर्षा की थी तैयारी, बारिश से सफल नहीं हो सका

रामगढ़ अधिवेशन में रांची के एक प्रमुख व्यवसायी धर्मचंद्र सरावगी को विमान से महाधिवेशन स्थल पर पुष्प वर्षा की जिम्मेदारी दी गयी थी। अधिवेशन के उदघाटन के अवसर पर आकाश से पुष्पवर्षा करना था। निर्धारित समय पर धर्मचंदजी अपने फ्लाइंग क्लब का वायुयान लेकर रामगढ़ की ओर उड़े, लेकिन तूफान और झमाझम बारिश के कारण विमान संकट में फंस गया, जिसके बाद उन्हें बड़े साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए विमान को जमशेदपुर हवाईअड्डे पर उतार लिया था।

नेता जी ने किया था समानांतर अधिवेशन

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी गांधीजी समेत अन्य कांग्रेसी नेताओं से मतभेद के बाद रामगढ़ में समानांतर अधिवेश किया था तथा पूरे नगर में एक विशाल शोभा यात्रा निकली थी। इसमें महंथ धनराज पुरी, कैप्टन शाहनवाज खां, कैप्टन लक्ष्मी बाई सहगल, शीलभद्र जैसे दिग्गज लोग शामिल हुए थे। सुभाष चंद्र बोस रांची से रामगढ़ आए थे। नेताजी के साथ उनके निकट सलाहकार डा. यदु मुखर्जी व कई अन्य नेता भी थे।

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