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देश एवं समाज को पुष्ट करना ही पत्रकारिता का उद्देश्य : डॉ. नारायण


दरभंगा:- जाने- माने राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जितेन्द्र नारायण ने वर्तमान दौर में निर्भिक पत्रकारिता को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया और कहा कि देश एवं समाज को पुष्ट करना ही पत्रकारिता का उद्देश्य रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में बाजार ने इसमें बाधा उत्पन्न कर दी है।
डॉ. नारायण ने बुधवार को यहां ख्यातिलब्ध पत्रकार सह समाजसेवी स्व.रामगोविंद प्रसाद गुप्ता की 86वीं जयंती के अवसर पर “नोबेल शांति पुरस्कार और निर्भीक पत्रकारिता” विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की पत्रकारिता मूल्यों पर आधारित रही है लेकिन पश्चिमी पत्रकारिता का मूल ध्येय इससे इतर रहा है। पश्चिमी पत्रकारिता ने अपना हित साधने के लिए पत्रकारिता को साधन की तरह इस्तेमाल किया है और हमने सत्य को स्थापित करने ,जुल्म और जुल्मी का प्रतिकार करने के लिए पत्रकारिता का प्रयोग किया है। इस वर्ष शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए दो पत्रकारों का चयन हुआ है जिसके चलते एकबार फिर पत्रकारिता और पत्रकार के दायित्वों का विश्लेषण आरंभ हो गया है। राजनीतिक विश्लेषक ने आगे कहा कि पत्रकारों को सत्य आधारित पत्रकारिता करनी चाहिए। प्रजातंत्र को जीवित रखने के लिए पत्रकारों का यह दायित्व महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता का सामान्यतः चरित्र पक्षपातपूर्ण एवं दलहित में होता है, ऐसे में पत्रकारों की पैनी निगाह हमेशा बनी रहनी चाहिए । उन्होंने कहा कि सत्ता के समर्थन एवं विरोध की प्रवृत्ति की पत्रकारिता ने प्रजातंत्र का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। उन्होंने कहा कि सत्य आधारित पत्रकारिता के लिए पत्रकारों का निर्भीक होना एवं पक्षपात रहित होना पत्रकारिता जगत की प्राथमिक प्रवेश की प्राथमिक शर्त होनी चाहिए।
डॉ. नारायण ने नोबेल पुरस्कारों का गहराई से विवरण देते हुए कहा कि पत्रकारिता निर्भीक ही होती है, समझौता करने वाला और दबाव में सत्य को दबाना पत्रकारिता की रवायत नहीं है। इसकी उत्पत्ति तो बाजारवाद से हुई है। बाजार ने मूल्यों पर आघात किया है। हर तरफ स्वार्थ हावी हो गया। कोई संस्था ऐसी नजर नहीं आती जहाँ भ्रष्टाचार ना हो। इस स्थिति में बदलाव निर्भीक पत्रकारिता ही ला सकती है। देश एवं समाज को पुष्ट करना ही पत्रकारिता का उद्देश्य रहा है लेकिन बाजार ने इसमें बाधा उत्पन्न कर दी है। फिर भी स्व.रामगोविंद प्रसाद गुप्ता सरीखे पत्रकारों की टोली आज भी जीवंत है।
राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि इस साल शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए दो पत्रकारों के नाम चुने गए हैं। फिलीपींस की पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मुरातोव को अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करने के लिए यह सम्मान दिया जाना है। जहां रेसा ने फिलीपींस में राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतर्ते की सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ अपने मीडिया ग्रुप ‘रैप्लर’ के जरिए पत्रकारिता को धार दी, तो वहीं रूस में पुतिन सरकार के खिलाफ मुरातोव ने भी ऐसा ही किया।
समाजशास्त्री एवं पूर्व विधान पार्षद डॉ. विनोद चौधरी ने कहा कि सत्ता, अधिकारी और समाज सबको सजग करने की जिम्मेवारी का वहन आज भी मीडिया कर रही है। शायद यही कारण है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में नोबेल नहीं दिया जाता है फिर भी पत्रकारों को उनके कार्यों के नोबेल पुरस्कार मिलता आ रहा है। स्व. गुप्ता के द्वारा तैयार पत्रकारों की टोली दरभंगा से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक निर्भीकता से कलम चला रही है। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पत्रकार रहे बेनीपुरी विधायक डॉ. विनय कुमार चौधरी ने कहा कि निर्भीकता के बगैर पत्रकारिता अस्तित्व हीन है। बिना सत्य के इसका कोई मोल नहीं है। यह निर्भीकता ही है जिसके बल पर आज भी पत्रकार स्व.रामगोविन्द प्रसाद गुप्ता के कार्यों की चर्चा होती है।
वरीय पत्रकार डॉ विष्णु कुमार झा ने बताया कि यह नोबेल पुरस्कार सांकेतिक है और यदि आज कहीं भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कायम है तो उसका श्रेय मीडिया को ही दिया जाना चाहिए। रसायनशास्त्री डॉ. प्रेम मोहन मिश्र ने कहा कि पत्रकार शांति के दूत है और सामाजिक सौहार्द के साथ-साथ कुरीतियों का प्रतिकार करना उनकी प्राथमिकता होती है। संगोष्ठी को पत्रकार डॉ. कृष्ण कुमार, पत्रकार डॉ हरिनारायण सिंह समेत अन्य ने भी संबोधित किया। संगोष्ठी का संचालन डॉ एडीएन सिंह ने किया।

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