April 14, 2021

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

भक्तिपूर्ण वातावरण में सप्त दिवसीय ध्यान साधना शिविर का समापन

सहरसा:- शहर के गांधी पथ संतमत सत्संग मंदिर मे चल रहे सप्तदिवसीय ध्यान साधना शिविर का समापन सोमवार को प्रात:कालीन सतसंग के बाद हो गया।जिसमे उपस्थित पूज्यपाद बाबा को समदन गाकर विदाई दी गई । आयोजित सतसंग मे प्रवचन करते हुए संतमत के वर्तमान आचार्य स्वामी चतुरानंद जी महराज ने कहा कि चार खामियों में चौरासी लाख योनियाँ हैं । अण्डज , पिण्डज , उष्मज और अंकुरज – स्थावर ये चार खानियाँ हैं। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियों में काल , कर्म , स्वभाव , और गुण के घेरे में घूमते रहता है। कभी दया करके इस जीव को परमात्मा मनुष्य का शरीर देते हैं। यह शरीर संसार सागर को पार करने के लिए नाव है। नाव के लिए अनुकूल पवन होना चाहिए। परमात्मा की कृपारूपी अनुकूल वायु है कि उस विषय की ओर से फेरती है।इस नाव के लिए मल्लाह सद्गुरु हैं। सद्गुरु उसे कहते हैं जो स्वयं सद्ज्ञान जाने , सद्ज्ञान की शिक्षा दे , स्वयं परमात्मा का ध्यान करे और दूसरे को ध्यान करने के लिए प्रेरणा दे।मनुष्य शरीर रूप नाव प्राप्त है। स्वामी अनुभवाऩद जी महराज ने कहा कि मन में रत्ती भर भी विषय वासना रहने पर भगवत्प्राप्ति नहीं होती है। सूत में छोटी सी गिरह भी रहने पर उनमें सूई नहीं पिरोई जा सकती है। मन जब वासना रहित होकर शुद्ध होता है तभी सच्चिदानंद प्राप्त होता है। स्वामी रामलग्न ब्रहाचारी , स्वामी प्रेमानंद जी महराज , स्वामी विप्रानंद जी महराज ,स्वामी महेशानंद जी महराज ने कहा कि गुरुतीर्थ बड़ा उत्तम तीर्थ है।मैं उसका वर्णन करता हूँ।गुरु के अनुग्रह से शिष्य को लौकिक आचार, व्यवहार का ज्ञान होता है , विज्ञान की प्राप्ति होती है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जैसे सूर्य सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करते हैं । उसी प्रकार गुरु शिष्यों को उत्तम बुद्धि देकर उनके अन्तर्जगत् को प्रकाशपूर्ण बनाते हैं। सूर्य दिन में प्रकाश करते हैं , चन्द्रमा रात में प्रकाशित होते हैं और दीपक केवल घर के भीतर उजाला करता है। परन्तु गुरु अपने शिष्य के हृदय में सदा ही प्रकाश फैलाते रहते हैं।वे शिष्य के अज्ञानमय अन्धकार का नाश करते हैं। अतः शिष्य के लिए गुरु ही सबसे उत्तम तीर्थ है।

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