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बाबा विश्वनाथ की नगरी गणपति आराधना में लीन


वाराणसी:- काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ की नगरी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तद्नुसार शुक्रवार को गणपति आराधना में आकंठ डूब गई है। बड़ा गणेश स्थित नगर के प्रमुख गणेश मंदिरों में प्रथम पूज्य विघ्न विनाशक प्राकट्य मध्याह्न में हुआ । प्राकट्य बेला में गणपति का पंचोपचार, षोडशोपचार पूजन किया गया। पूजन-अर्चन के दौरान गणपति को नैवेद्य में मोदक लड्डू, ऋतुफल, हरा दूर्वा चढ़ाया गया। गणेश सहस्रनाम, गणेश चालीसा, गणेश मंत्र आदि का पाठ कर विधिवत आराधना की गई। इस दौरान मंदिरों में और आसपास ‘गणपति बप्पा मोरया’मंगलमूर्ति मोरया की गूंज रही। मंगलमूर्ति के दर्शन के लिए श्रद्धालु कतारबद्ध रहे। घरों में भी श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया। श्रद्धालु ने गणपति की आराधना के लिए व्रत भी रखा है। नगर के पूजा पंडालों में ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह से कहीं पांच दिवसीय तो कहीं सात दिवसीय उत्सव मनाया जा रहा है। मानसरोवर स्थित श्रीराम तारक आंध्र आश्रम में भी श्रीगणेश नवरात्र महोत्सव का आगाज हो गया है। नूतन बालक गणेशोत्सव समाज सेवा मंडल का सात दिवसीय ऑनलाइन महोत्सव शुरू हो गया है। महोत्सव का उद्घाटन संजय कुमार गोरे, (अधीक्षण अभियंता, लोक निर्माण विभाग, प्रभारी – काशी विश्वनाथ कॉरिडोर) ने की । उद्घाटन वैदिक मंगलाचरण से हुआ। सांगीतिक मंगलाचरण “मंगल मुद सिद्धि सदन” को कौस्तुभ दीक्षित और संस्कृत में स्वागत गीत स्नेहा कोटेकर ने प्रस्तुत किया। अगस्त्य कुंड स्थित शारदा भवन में गणेशोत्सव पूरे श्रद्धाभाव से हो रहा है लेकिन कोरोना संकट को देख शोभायात्रा और अन्य सामूहिक आयोजनों को स्थगित कर दिया गया है। बताते चलें कि इस बार 59 वर्षों बाद गणेश चतुर्थी पर सूर्य, बुध, शुक्र और शनि ग्रह अपनी-अपनी राशियों में राशि में है। महामंगलकारी योग में गणेश जी के पूजन से नागरिकों के साथ पूरे देश में सुख समृद्धि और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आचार्य मनोज उपाध्याय ने बताया कि चार ग्रहों की स्वराशि में मौजूदगी का ये सुखद मंगलकारी योग 59 वर्ष पहले 3 सितंबर 1962 को पड़ा था। यह खास संयोग पूरे भारत के लिए मंगलकारी है। ब्रह्म और रवियोग में गणपति की प्रतिमा स्थापित की गई।

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