दिनांक:- 20 जनवरी 2019,                   स्थानः- दी कार्निवाल, राँची।

शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द फाउंडेशन, राँची के तत्वावधान में ‘‘वृक्ष हैं धरा के भूषण,करते दूर प्रदूषण’’ विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन ‘‘दी कार्निवाल हॉल’’, राँची में आयोजित किया गया। देश की एकता के प्रतीक हमारे राष्ट्र गान जन गण मन से कार्यक्रम का आरम्भ हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरेण्य गुरूभ्राता श्री हरीन्द्रानन्द जी ने कहा वन की महत्ता से हम सभी परिचित हैं। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखेंगे, तो हम पायेंगे कि पूर्व में वनों का प्रतिशत ज्यादा था, जनसंख्या कम था, पशुओं की संख्या कम थी। इसलिए इसके महत्व के बारे में उतना नहीं सोचते थे, लेकिन बाद में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, संरचनात्मक विकास की वृद्धि के साथ-साथ वनों का विनाश होता गया, जिसका परिणाम आज हाल के घटनाओं, जैसा कि हम सभी जानते हैं, केदारनाथ, बद्रीनाथ में आया भू-स्खलन, केरल,उत्तराखण्ड एवं हिमाचल से आया भू-स्खलन, लातूर (महाराष्ट्र) में सूखा, तो चेन्नई में सुनामी के रूप में प्रकट होता है। कहने का तात्पर्य है कि कहीं सूखा तथा कहीं बाढ़, तो कहीं Landslide के रूप में हमारे सामने आता है। हमें केवल संकल्प ही नहीं कार्यान्वयन करना चाहिए।

शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द फाउंडेशन के अध्यक्षा बरखा सिन्हा ने बताया कि अभी भारत में वनों का क्षेत्रफल 79.42 Million Hectare है, जो कि कुल भू-भाग का 24.16% है, जबकि झारखण्ड के कुल वनों का क्षेत्रफल 23605 Km2   है, जो कि कुल भू-भाग का करीब 26.61% है। सामान्य परिस्थिति में कुल भू-भाग का एक तिहाई, यानि 33.33% भू-भाग होना चाहिए, जो कि झारखण्ड में करीब 3.50% अभी भी कम है। पुनः पहाड़ी क्षेत्रों में ढलान (Slope) के अनुसार वनों का प्रतिशत 40% से 80% तक होना चाहिए। प्रो॰ रामेश्वर मंडल ने वनों से मिलने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ के बारे में जानकारी दीं

इस कार्यक्रम में झारखण्ड एवं बंगाल राज्य से लगभग पंद्रह सौ लोगों ने भाग लिया और अपने विचार रखे कि किस तरह से वृक्षों का संरक्षण किया जाय ताकि प्रदूषण से लड़ा जा सके और हम स्वच्छ हवा में साँसे ले सकें।

शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द फाउंडेशन, राँची के तत्वावधान में ‘‘वृक्ष हैं धरा के भूषण,करते दूर प्रदूषण’’ विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन ‘‘दी कार्निवाल हॉल’’, राँची में आयोजित किया गया। देश की एकता के प्रतीक हमारे राष्ट्र गान जन गण मन से कार्यक्रम का आरम्भ हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरेण्य गुरूभ्राता श्री हरीन्द्रानन्द जी ने कहा वन की महत्ता से हम सभी परिचित हैं। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखेंगे, तो हम पायेंगे कि पूर्व में वनों का प्रतिशत ज्यादा था, जनसंख्या कम था, पशुओं की संख्या कम थी। इसलिए इसके महत्व के बारे में उतना नहीं सोचते थे, लेकिन बाद में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, संरचनात्मक विकास की वृद्धि के साथ-साथ वनों का विनाश होता गया, जिसका परिणाम आज हाल के घटनाओं, जैसा कि हम सभी जानते हैं, केदारनाथ, बद्रीनाथ में आया भू-स्खलन, केरल,उत्तराखण्ड एवं हिमाचल से आया भू-स्खलन, लातूर (महाराष्ट्र) में सूखा, तो चेन्नई में सुनामी के रूप में प्रकट होता है। कहने का तात्पर्य है कि कहीं सूखा तथा कहीं बाढ़, तो कहीं Landslide के रूप में हमारे सामने आता है। हमें केवल संकल्प ही नहीं कार्यान्वयन करना चाहिए।

शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द फाउंडेशन के अध्यक्षा बरखा सिन्हा ने बताया कि अभी भारत में वनों का क्षेत्रफल 79.42 Million Hectare है, जो कि कुल भू-भाग का 24.16% है, जबकि झारखण्ड के कुल वनों का क्षेत्रफल 23605 Km2   है, जो कि कुल भू-भाग का करीब 26.61% है। सामान्य परिस्थिति में कुल भू-भाग का एक तिहाई, यानि 33.33% भू-भाग होना चाहिए, जो कि झारखण्ड में करीब 3.50% अभी भी कम है। पुनः पहाड़ी क्षेत्रों में ढलान (Slope) के अनुसार वनों का प्रतिशत 40% से 80% तक होना चाहिए। प्रो॰ रामेश्वर मंडल ने वनों से मिलने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ के बारे में जानकारी दीं

इस कार्यक्रम में झारखण्ड एवं बंगाल राज्य से लगभग पंद्रह सौ लोगों ने भाग लिया और अपने विचार रखे कि किस तरह से वृक्षों का संरक्षण किया जाय ताकि प्रदूषण से लड़ा जा सके और हम स्वच्छ हवा में साँसे ले सकें।

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