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एक नयी सुबह का

गूंजने लगे मिथिलांचल के मनमोहक लोक उत्सव सामा-चकेवा के गीत


बेगूसराय:- ज्योति का पर्व दीपावली संपन्न होते ही बिहार के लोक आस्था और सूर्योपासना के महापर्व छठ की तैयारी तेज हो गई है। इसके साथ ही विभिन्न लोक संस्कृति, लोक कला और लोक पर्व को अपनी धारा में बसाए मिथिलांचल में लोक उत्सव सामा-चकेवा की तैयारी भी शुरू हो गई है। 11 नवंबर से शुरू होने वाले मिथिला के इस लोक उत्सव को लेकर कुम्हार परिवार के साथ ही कुछ बहनों ने मिट्टी को खूबसूरत आकर देकर सामा चकेवा और चुगला आदि की प्रतिमा बनाना शुरू कर दिया है।भाई-बहन के कोमल और प्रगाढ़ रिश्ते को बेहद मासूम अभिव्यक्ति देने वाला यह लोक उत्सव पर्व मिथिला संस्कृति के समृद्धता और कला का एक अंग है, जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त बाधाओं को भी तोड़ता है। छठ के अंतिम दिन सुबह में सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद शाम से शुरू होने वाले इस लोक पर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा की रात होती है। भाई-बहन के अनमोल प्यार के प्रतीक में आठ दिनों तक रात भर महिलाएं सामा खेलती है और अंतिम दिन चुगला का मुंह जलाने के साथ ही इसका समापन होता है। इस उत्सव के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभईयां, टिहुली, कचबचिया, चिरौंता, हंस, सतभैंया, चुगला, बृंदावन सहित अन्य मूर्ति को बांस से बने चंगेरा में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाईयों के लिए मंगलकामना करती है। संध्या बेला में ”गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो, सामा खेले चलली भैया संग सहेली, साम चके अबिह हे जोतला खेत में बैसिह हे, भैया जीयो हो युग युग जीयो हो तथा चुगला करे चुगली बिलैया करे मियांऊं” सरीखे गीत एवं जुमले के साथ जब चुगला दहन करती है, तो वह दृश्य मिथिलांचल की मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा कर देती है। अन्य जगहों की तरह मिथिलांचल में भी तेजी से बढ़ रहे बाजारी और शहरीकरण के बावजूद यहां के लोग अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं। मिथिला तथा कोसी के क्षेत्र में भातृ द्वितीया, रक्षाबंधन की तरह ही भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक लोक पर्व सामा चकेवा में गीत रोज होता है लेकिन देवोत्थान एकादशी की रात से प्रत्येक आंगन में नियमित रूप से महिलाएं समदाउन, ब्राह्मण गोसाउनि गीत, भजन आदि गाकर बनायी गयी मूर्तियों को ओस चटाती है। फिर कार्तिक पूर्णिमा की रात मिट्टी के बने पेटार में संदेश स्वरूप दही-चूडा भर सभी बहनें सामा चकेवा को अपने-अपने भाई के ठेहुना से फोड़वा कर श्रद्धापूर्वक खोइछा में लेती है। बेटी के द्विरागमन की तरह समदाउन गाते हुए विसर्जन के लिए समूह में घर से निकलती है और नदी, तालाब के किनारे या जुताई किए गए खेत में चुगला के मुंह में आग लगाया जाता है। मिट्टी तथा खर से बनाए बृंदावन में आग लगाकर बुझाती है और सामा-चकेवा सहित अन्य मूर्ति को पुन: अगले साल आने की कामना करते हुए विसर्जन किया जाता है। हालांकि अब सामा-चकेवा मिथिला से निकल हिमालय की तलहट्टी से लेकर बंगाल तक मनाया जाता है। बंगला भाषी होने के बाद भी वहां की महिलाएं एवं युवतियां सामा-चकेवा पर मैथिली गीत गाती हैं। जबकि चम्पारण में भोजपुरी और मैथिली मिश्रित सामा-चकेवा के गीत गाए जाते हैं, लेकिन खेल का रस्म सब जगह एक समान है। सामा-चकेवा के संबंध में कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र शाम्ब के बीच अपार स्नेह था। श्यामा ऋषि मुनियों की सेवा करने बराबर उनके आश्रमों में सखी डिहुली के साथ जाया करती थी।

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