February 27, 2021

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कभी जवानों के शरीर पर गोलियां दागने के लिए उठते थे हाथ, आज इनके बदन को ढंकने के लिए चल रही है उंगुलियां

आत्मसमर्पण करने के नक्सली रामपोदो लोहरा की दिलचस्प कहानी

रांची:- यह कहानी है हिंसा का रास्ता छोड़ कर शांति का मार्ग चुनने वाले रामपोदो लोहरा की। वर्षों तक घर से दूर रह कर पुलिस के लिए चुनौती बने रामपोदो लोहरा के हाथ कभी पुलिस जवानों के शरीर पर गोलियां दागने के लिए उठते थे, लेकिन आज सिलाई मशीन पर इनकी उंगुलियां जवानों के बदल को ढंकने के लिए चल रही है। ऑपरेशन नई दिशाएं के तहत पुलिस के समक्ष वर्ष 2013 में हथियार डालने वाले रामपोदो को आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत कई सुविधाएं उपलब्ध करायी गयी है। इसी सिलसिले में उनके हुनर के अनुरूप उन्हें पुलिस की ओर से रांची में जगह उपलब्ध करायी गयी है, जहां वे पुलिस जवानों के लिए भी वर्दी और कपड़े की सिलाई करते है।
पुलिस की वर्दियां सीलने मे आज रामपोदो लोहरा का कोई सानी नहीं है। हालांकि, सभी को यह जानकर हैरत होती है कि आज जितनी तेजी से इनके हाथ सिलाई मशीन पर चलते हैं ,कभी यही हाथ उससे भी ज्यादा तेजी से गोलियां चलाते थे।.. मतिभ्रम होने पर नक्सली बन बैठा रामपोदो आज पुलिसकर्मियों का चहेता है। रामपोदो कुछ वर्ष पहले तक कुंदन पाहन के दस्ते का सक्रिय सदस्य था और नक्सलियों के लिए कपड़े सीलता था , लेकिन, समय के साथ जैसे ही उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, तो वह मुख्यधारा मे लौट गया।आज रामपोदो रांची के पुलिसलाइन मे पुलिस के जवानों के लिए वर्दी सील रहा है। रामपोदो को अब अच्छाई और बुराई के बीच का फर्क समझ आ ही गया है। परिवार की अहमियत भी समझ आने लगी है। खुली हवा मे सांस लेना और समाज मे मिलजुल कर रहना उसे भाने लगा है। वे बताते है कि कई बार विभिन्न जंगल में पुलिस ने उनकी सिलाई मशीन को जब्त कर लिया, जबकि कई बार मुठभेड़ में उनकी जान बाल-बाल बची। जिसके बाद पदों ने मुख्य धारा में वापस लौटने का निर्णय लिया और वे अपने परिवार के साथ रह कर आम नागरिक की तरह जीवन व्यतीत कर रहा है। वे भटके हुए युवाओं से भी अपील करते है कि सभी समाज की मुख्य धारा में लौट आये, क्योंकि नक्सली दस्ते में रहने के दौरान इधर-उधर भागने के सिवा कुछ नहीं मिलता, परिवार भी पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है।
रांची के ग्रामीण पुलिस अधीक्षक नौशाद का कहना है कि रामपोदो ने पुलिस की “नई दिशायें“ कार्यक्रम का लाभ लेते हुए 2013 मे मुख्यधारा मे वापसी की थी। इनके हुनर को पहचान कर पुलिस ने इन्हें सम्मान से जीने का एक जरिया दिया। तब से ये जवानों के साथ-साथ पुलिस पदाधिकारियों की वर्दियां सील रहे हैं। रांची के ग्रामीण एसपी नौशाद आलम कहते हैं कि नक्सलियों के बहकावे मे आकर जो लोग राह भटक गए थे ..धीरे-धीरे वे अब अपने घरों को लौट रहे हैं।
रामधारी सिंह दिनकर रचित रश्मिरथी की एक पंक्ति है “जब नाश मनुष्य का छाता है, विवेक पहले मर जाता है“ , च्छे-भले इंसान को शैतान बनते देर नहीं लगती। लेकिन, अच्छे-बुरे का ज्ञान हो जाने पर डाकू रत्नाकर भी वाल्मीकि और अंगुलीमाल भी संत बन जाता है। रामपोदो भी अब बिलकुल बदल चुका है और रामपोदो को उम्मीद है कि जल्द ही भटके हुए युवा जल्द ही हिंसा का रास्ता छोड़ कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होंगे।

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