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सोहराई पूजा परंपरागत उत्साह के साथ मनायी गयी


रांची:- पौराणिक काल से ही सोहराई पूजा की परंपरा रही है। आदिवासी और मूलवासी इलाकों में सोहराई पर्व का खास महत्व है दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला सोहराई पर्व गाय, बैल, भैंस, भेड़- बकरी समेत अन्य पालतू मवेशियों के लिए मनाया जाने वाला पारंपरिक त्योहार है। सोहराई पर्व की तैयारी में सभी मवेशी पालक दीपावली की तरह ही मवेशियों के घर की साफ सफाई करते हैं। कई मवेशी पालक गोहार लिपाई-पोताई कर प्रवेश द्वार में रंगोली भी बनाते हैं। सभी मवेशियों को नहलाया जाता है। फिर पारंपरिक विधि से सोहराई पूजा पाठ किया जाता है। सोहराई के दिन घर के लोग उपवास भी रखते हैं। सबसे पहले पालतू मवेशियों को अरवा चावल और उरद के बने सादे पकवान खिलाये जाते हैं। मवेशियों को पकवान खिलाने के बाद ही घर के अन्य सदस्य अन्न ग्रहण करते है।
सभी मवेशियों को गेंदा फूल या अन्य फूलों का माला बनाकर पहनाया जाता है। रंग बिरंगे रंगों से मवेशियों में आकर्षक आकृतियां भी बनायी जाती हैं। शाम ढलने से पूर्व सभी मवेशियों को गांव के चौक चौराहे या निश्चित जगह पर खदेड़ा जाता है। गांव के लोग मवेशियों को नाचते गाते सोहराई का उत्सव मनाते हैं। पारंपरिक विधि के अनुसार मवेशी पालन से घर मे लक्ष्मी आती है, धन का आगमन होता है इसलिये मवेशियों के लिए दीपावली के दूसरे दिन सोहराई मनायी जाती है।
ज्यादातर लोग गाय और बकरी पालते हैं गाय-भैंस और बकरी पालन आदिवासी मूलवासियों के आजीविका का साधन माना जाता है। प्रत्येक वर्ष सोहराई का पर्व लोगों के साथ साथ मवेशियों में भी उत्साह का संचार करता है। ऐसा माना जाता है कि सोहराई पर्व का मवेशियों को आभास होता है इसलिए अन्य दिनों की तुलना में सोहराई के दिन मविशियों का चहल पहल देखने लायक रहता है।

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