आलेख : पंकजजीत सिंह

यह संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि होनी चाहिए। प्रश्न है। हम शिव कैसे बनें ? शिवत्व उपलब्ध हो कैसे ?
सोचने का अर्थ हुआ स्वयं से बोलना। जैसी सोच होगी, वैसा संकल्प होगा और जैसा संकल्प होगा वैसा आचरण होगा। सोच में, संकल्प में शिव होना चाहिए। शिव का अर्थ है कल्याण। मन में, संकल्प में विश्व कल्याण की भावना होनी चाहिये। “मान सहित विष खाइके शंभु भये जगदीश।” शिव ने जगत कल्याण के निमित्त विषपान किया। कलंकी चंद्रमा को अपने भाल पर स्थान दिया, हृदय के बल ससरने वाले सर्पों को अपना कण्ठहार बनाया, पतितपावनी गंगा की तीक्ष्ण धार से पृथ्वी की अभिरक्षा के निमित्त उसे अपनी जटाओं में रखा।
सृष्टि निर्माण के पूर्व एकमात्र शिव थे। उनकी इच्छा हुई “एकोहम बहुस्याम” अर्थात एक मैं हूँ, बहुत हो जाऊं। वह ईश्वर ही स्वयं को जीव जगत के रूप में व्यक्त किया। वह परम सत्ता अव्यक्त से व्यक्त हुई। यह संसार शिव से भिन्न नहीं। भेददृष्टि मात्र भ्रम है। वह शिव ही विभिन्न रूपों में भासित होता है। यह समग्र सृष्टि उस निराकार ईश्वर की साकार लीला है।
वैराग्य का अर्थ संसार का त्याग नहीं, पलायन नहीं प्रत्युत विवेक द्वारा भीतर से बाहर तक स्वयं की व्याप्ति को अनुभूत करना। परमात्मा का प्रथम अवतार ही तो यह संसार है। पंच तत्वों का निर्माण भी उसी चैतन्य से हुआ है। उसी परमात्मा से हुआ है। आत्मा परमात्मा से भिन्न नहीं। उसी की अभिव्यक्ति मात्र है।
अपने वास्तविक अर्थ का वहन करने वाला  – शब्द शिव, जिसका अर्थ कल्याण है। उस शिव के इस सुंदर संसार में अशिवों की भरमार हो आई है। उसकी साधना के नाम पर अशिव आचरण होते रहते हैं। शिव पूजन में प्रयुक्त विभिन्न मादक पदार्थों को अर्पित किये जाने की परिपाटी है। मादक पदार्थों के अर्पण से तात्पर्य अकल्याणकारी भावों का त्याग है और जब अशुभत्व का त्याग होता है तो शेष बचता है – शिव। अर्थात कल्याण। भगवान नटराज के अविराम नृत्य की भंगिमा में अपस्मार दानव कदाचित इसी का प्रतीक है। ऐसी अगणित प्रेरणाएं शैव विग्रह के साथ जुड़ी हुई हैं।
मानव मन में शुद्ध परमात्मा का जागरण ही आत्म जागरण है। जिसके हृदय की शुद्ध चिदानंद भूमि पर प्रेम के पुष्प खिल गए।  वह परमात्मा को उपलब्ध हो गया। जिसने प्रेम को जिया वस्तुतः वही परमात्मा को उपलब्ध हुआ। जिसके जीवन मे प्रेम के पुष्प नहीं खिले, भला परमात्मा की अनुभूति कैसे हो। परमात्मा पूजा और प्रार्थनाओं से नहीं, प्रेम से लभ्य है।
जब चिंतन घनीभूत होता है तो वह भाव में परिणत हो जाता है और यही विचार भाव मार्ग का का अनुसरण कर प्रेम की आधार भूमि पर पहुंचता है और आत्म जागृति हो जाती है। एक आध्यात्मिक क्रांति घटित होती है। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ की अनुभूति होने लगती है। छान्दोग्य उपनिषद में आए इस सूत्र का अर्थ है सारा जगत ब्रह्म है। ब्रह्म जगत का कारण है, उसी से जगत उत्पन्न होता है और उसी में लीन होता है।
शिवत्व पूजा नहीं, प्रार्थना नहीं, उपलब्धि है। सम्यक आचरण है। हमें शिव की पूजा शिव के सदृश्य होकर करनी चाहिए।

          त्वद्रव्यम जगत्गुरू तुभ्यमेव समर्पये।”
                       
                      
           
   

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