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छठ में दिखती है भारत की संस्कृति, जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग करते हैं इसमें शिरकत


पटना:- लोकआस्था का महान पर्व है छठ और इस पर्व में जाति और धर्म की दीवारें टूट जाती हैं. छठ पूजा की पहचान साफ सफाई और पवित्रता के लिए भी होती है. क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सभी समुदाय के लोग इस महान पर्व में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं. खास बात ये है कि जिस शिद्दत के साथ हिन्दू समुदाय छठ करते हैं, उतनी ही साधना और आस्था के साथ मुस्लिम समुदाय भी इसमें अपरोक्ष रूप से शामिल होते हैं.
सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल छठ
सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल बन चुकी छठ पूजा में जिन चूल्हों का इस्तेमाल होता है उसे पटना में मुस्लिम आबादी सात दशकों से तैयार कर रही है. राजधानी के वीरचंद पटेल पथ के दोनों ओर बड़े पैमाने पर चूल्हों को तैयार किया जाता है. मिट्टी से बने इन चूल्हों को कोई और नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार मिलकर तैयार करते हैं.
2 दशक से महिला कर रही चूल्हे का निर्माण
एक अधेड़ मुस्लिम महिला आसमां बताती हैं कि दो दशकों से वो चूल्हों का निर्माण कर रही हैं. वो सुबह-सुबह नहाने के बाद से ही चूल्हे बनाने में लग जाती हैं.
मुफ्त में भी दिया जाता है चूल्हा
दुनिया और देश के किसी भी हिस्से में सांप्रदायिक झड़प के बाद हिन्दू और मुस्लिम की बहस तेज हो जाती है. लेकिन पटना में चूल्हे बनाने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग इससे ऊपर उठ चुके हैं. मिट्टी मंगाने से लेकर चूल्हे बनाने तक में मुस्लिम धर्म के लोग शामिल रहते हैं और अगर कोई हिन्दू आर्थिक रूप से कमजोर है तो उन्हें मुफ्त में चूल्हा दे दिया जाता है. हालांकि, यहां मिट्टी से बने चूल्हे की कीमत 100 रुपए से लेकर दो सौ रुपए तक है.
कभी नहीं आता हिंदू-मुस्लिम का ख्याल
रस्मा परवीन के मुताबिक, उनका पूरा घर ही चूल्हे बनाने के कारोबार में लगा हुआ है. दुर्गा पूजा से पहले से लेकर छठ तक वो करीब 150 चूल्हे बेच लेती हैं और 10 से 15 हजार की कमाई हो जाती है. रस्मा कहती हैं ‘हिन्दुओं से इतना प्यार मिलता है कि कभी हिन्दू और मुस्लिम का ख्याल आया ही नहीं.’
इसी तरह पूर्णिया से आई रूही भी छठ के लिए चूल्हे का निर्माण करती हैं. इंसानियत से बढ़कर कोई मजहब नहीं है. लोकआस्था के महान पर्व में ये बात साबित हो जाती है. साबित ये भी होता है कि हिन्दू हो या मुस्लिम छठ में ये दीवार टूट जाती है.

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