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प्रोन्नति में आरक्षण की वर्तमान नीति को जारी रखने की सिफारिश

मुख्यमंत्री को सीएस की अध्यक्षता में गठित समिति ने सौंपी रिपोर्ट



रांची:- झारखंड में सरकार की सेवाओं और पदों के अधीन प्रोन्नति, प्रशासनिक दक्षता और क्रीमी लेयर में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता पर एक अध्ययन रिपोर्ट तैयार करने के लिए गठित तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। मुख्य सचिव सुखदेव सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी। इस समिति में शामिल अपर मुख्य सचिव एल खियांगते और प्रधान सचिव वंदना डाडेल और सचिव के.के. सोन शामिल थे। समिति ने प्रोन्न्ति में आरक्षण की वर्तमान नीति को जारी रखने की सिफारिश की हैं।
समिति को अध्ययन के द्वारा यह जानकारी मिली कि 34 विभागों में से 29 विभागों ने कर्मचारियों की जाति श्रेणीवार संख्या सहित सीधी नियुक्ति या प्रोन्नति के आधार पर भरे गए पदों की कुल संख्या पर अपनी रिपोर्ट ऑफलाइन प्रस्तुत की है। वहीं 10 विभागों ने इन सेवाओं में प्रत्येक जाति वर्ग में कार्यरत कर्मचारियों की सेवा श्रेणीवार संख्या सहित रिपोर्ट प्रस्तुत की है ।जबकि एचआरएमएस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 34 विभागों में 31 प्रमुख विभागों में राज्य में कुल स्वीकृत पदों की कुल संख्या 3,01,1 98 है जिसमें से 57,182 पद प्रोन्नति के आधार पर भरे जाने हैं जबकि 2,44,016 पद सीधी नियुक्ति से भरे जाने हैं ।
समिति ने डेटाबेस की उपलब्धता की बाधाओं को ध्यान में रखते हुए, विशेष रुप से कतिपय विभागों में प्रोन्नति के संबंध में एक कार्य प्रणाली तैयार करने का निर्णय लिया, जो समिति को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से मूल्यांकन करने में सक्षम बनाएगी ।सभी विभागों से कर्मचारी डेटा – सूचना श्रेणीवार और पदनाम के अनुसार एकत्र की गई थी। इन आंकड़ों को मैनुअल रूप के साथ साथ ऑफलाइन रूप में भी मांगा गया था । इसके अलावा आंकड़ों की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए समिति ने मुख्य रूप से एचआरएमएस के ऑफलाइन डेटा का उपयोग किया। कर्मचारियों की प्रोन्नति के विश्वसनीय आंकड़ों तक समिति की पहुंच थी जिसके द्वारा विभिन्न रिपोर्ट तैयार किए गए और उनका विश्लेषण किया गया ।
समिति की ओर से बताया गया है कि जनरैल सिंह के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण पर पुनर्विचार किया गया । जनरैल सिंह केस (एसएलपी) (सी) 30621/2011 के निर्णय का सारांश हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट किया हैं कि प्रतिनिधित्व कि अपर्याप्तता पर नागराज मामले में निर्धारित मापदंडों पर राज्य द्वारा परिमाणात्मक डेटा एकत्र किया जाएगा, जिसे अदालतों द्वारा जांचा जा सकेगा ।
समिति को अनुशंसा की ओर से राज्य सरकार को अनुशंसा की गयी है कि संकलित और विश्लेषित आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट है कि सरकार में प्रत्येक स्तर पर प्रोन्नति वाले पदों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता है । राज्य भर में स्वीकृत प्रोन्नतिवाले पदों के विरुद्ध प्रोन्नति के आधार पर पद धारण करनेवाले कार्यरत कर्मचारियों की कुल संख्या से संबंधित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों का प्रतिशत क्रमशः 4.45 तथा 10.04 प्रतिशत है, जो राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (क्रमशः 12.08 प्रतिशत (एससी) और 26.20 प्रतिशत ( एसटी) के जनसांख्यिकीय अनुपात से बहुत कम है। चूंकि, राज्य की सेवाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व अपेक्षित स्तर से काफी नीचे है ,इसीलिए प्रोन्नति में आरक्षण की वर्तमान नीति को जारी रखना आवश्यक है। इस स्तर पर वर्तमान प्रावधान में किसी भी प्रकार की ढील देना या किसी भी खंड को हटाना न्यायोचित या वांछनीय नहीं होगा और बड़े पैमाने पर सामुदायिक हितो के विरुद्ध होगा। झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) तथा झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) और कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग को भी वर्षवार तथा श्रेणीवार विवरण के साथ परिणामों के डेटाबेस को बनाए रखने की आवश्यकता है की कितने एससी, एसटी, ओबीसी ने अनारक्षित श्रेणी के अंतर्गत योग्यता प्राप्त की है। सभी विभागों द्वारा आरक्षण नीति और उसके प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए अधिक कठोर और निरंतर निगरानी रखने के लिए कार्मिक विभाग के अंतर्गत एक पृथक कोषांग बनाया जाना चाहिए। समिति द्वारा यह भी अनुशंसा की गयी है कि कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग को भर्तियों, प्रोन्नतियों और अन्य संबंधित सूचनाओं पर वार्षिक प्रतिवेदन अवश्य प्रकाशित करना चाहिए ।

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