April 11, 2021

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ब्रिगेड परेड ग्राउंड में सात मार्च को पीएम मोदी की हुंकार, पढ़ें बंग, बांग्ला और बंगाल की पहचान इस मैदान की दास्तां

कोलकाता:- कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड…एक ऐसा ऐतिहासिक मैदान, जो प्लासी के युद्ध से लेकर वर्तमान राजनीति के रण का गवाह बन चुका है। राजनीतिक हलकों में कहा जाता है कि ब्रिगेड परेड ग्राउंड जिसका, बंगाल भी उसका। इस मैदान की हनक साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी नजर आई थी। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में जितनी भीड़ उमड़ी, उतने लोग तो ममता बनर्जी के नेतृत्व में आया पूरा महागठबंधन भी नहीं जुटा पाया था। पीएम मोदी सात मार्च 2021 को एक बार फिर परेड ग्राउंड में भाजपा की किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे बंगाल में पार्टी का भविष्य तय होने का अनुमान है, लेकिन उससे पहले रूबरू होते हैं उस ब्रिगेड परेड ग्राउंड से, जो बंग, बांग्ला और बंगाल की पहचान बन चुका है।
पीएम मोदी से पहले कांग्रेस ने दिखाई ताकत
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात मार्च को ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जनसभा को संबोधित करेंगे। अटकलें लग रही हैं कि पीएम मोदी के साथ मंच पर दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती और बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली भी नजर आ सकते हैं। अहम बात यह है कि पीएम मोदी से पहले कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठबंधन 28 फरवरी को इस मैदान में अपनी सियासी मौजूदगी दर्ज करा चुका है।

अंग्रेजों ने बनाया था यह मैदान

दरअसल, ब्रिगेड परेड ग्राउंड की कहानी साल 1857 से शुरू होती है। उस दौरान अंग्रेजों ने प्लासी का युद्ध जीता और बंगाल के मालिक बन गए। इसके बाद अंग्रेजों ने फोर्ट विलियम महल बनाया, जो इंग्लैंड के तीसरे किंग विलियम के नाम पर था। इस किले में अंग्रेजों की फौज रहती थी, जिसकी परेड के लिए किले के सामने एक मैदान बनाया गया और उसका नाम ब्रिगेड परेड ग्राउंड रखा गया।

खेलने नहीं, यह ठेलने वाला मैदान

गौर करने वाली बात है कि देश में बड़े-बड़े मैदानों की पहचान दो ही तरह से की जाती है। पहली खेलने के लिए और दूसरी सत्ताधीनों को ठेलने के लिए। ‘सिंहासन खाली करो तो जनता आती है’ जैसा नारा देने वाला पटना का गांधी मैदान इसी श्रेणी में आता है। वहीं, दिल्ली का रामलीला मैदान जिन्ना से अन्ना तक बदलते इतिहास का गवाह है। इन सबके बीच कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड खेलने नहीं, ठेलने वाली श्रेणी में आता है। फिलहाल, अंग्रेजों के जाने के बाद विलियम फोर्ट भारतीय सेना के कब्जे में आ चुका है, जहां पूर्वी कमान का मुख्यालय है। वहीं, किले के सामने मौजूद ब्रिगेड परेड ग्राउंड सरकार की संपत्ति बन गया है।

साल 1919 में हुई पहली राजनीतिक रैली

कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड ने पहली राजनीतिक रैली का स्वाद आजादी से पहले यानी साल 1919 में ही चख लिया था। उस दौरान चितरंजन दास और अन्य स्वतंत्रता सेनानी रोलेट एक्ट के विरोध में इस मैदान में जुटे और ऑक्टरलोनी स्मारक के पास बैठक की। ऑक्टरलोनी स्मारक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर सर डेविड ऑक्टरलोनी के याद में बनवाया गया था। उन्होंने साल 1804 में एंग्लो-नेपाली युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व किया था। अब इस स्मारक को शहीद मीनार कहा जाता है।

ऐसे शुरू हुआ राजनीतिक इस्तेमाल

बता दें कि इस मैदान का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे पहले वामपंथी दलों ने पहचाना। उन्होंने साल 1955 में 29 जनवरी के दिन इस मैदान पर सोवियत प्रीमियर निकोल एलेक्जेंड्रोविच और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के पहले सचिव ख्रु्श्चेव का स्वागत किया। उस दौरान देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री विधान चंद्र रॉय ने उन्हें आमंत्रित किया था।

मुजीब-उर-रहमान ने दिया जय भारत-जय बांग्ला का नारा

ब्रिगेड परेड ग्राउंड पर छह फरवरी 1972 को एक और रैली हुई। उस दौरान करीब 10 लाख लोग जुटे, जो बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीब-उर-रहमान और भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सुनने आए थे। यह वह दौर था, जब पश्चिम बंगाल पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश से दिल से जुड़ा था। तब बंग बंधु मुजीब-उर-रहमान ने जय भारत-जय बांग्ला का नारा दिया था।

आपातकाल के खिलाफ भी यहां उठी आवाज

आपातकाल के दौर से गुजरने के बाद साल 1977 में केंद्र और पश्चिम बंगाल दोनों जगह कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। बंगाल में वामपंथी दलों के हाथ में सत्ता आ गई और देश में कांग्रेस के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों का उदय होने लगा। उस दौरान साल 1984 में ब्रिगेड परेड ग्राउंड पर एक रैली हुई। इसमें ज्योति बसु, एनटी रामाराव, रामकृष्ण हेगड़े, फारूक अब्दुल्ला, चंद्र शेखर और इएमएस नंबूदरी पाद शामिल हुए। तब परेड ग्राउंड उस विचारधारा का गवाह बना, जो गैर कांग्रेसी सत्ता के गठजोड़ को तैयार कर रहा था।

परेड ग्राउंड में गूंजी बोफोर्स घोटाले की गूंज

साल 1984 के साढ़े चार साल बाद देश में सियासी भूचाल आ गया। उस दौरान वीपी सिंह ने राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगाया और इस्तीफा दे दिया। वह जनमोर्चा का चेहरा बने और उपचुनाव में इलाहाबाद से बड़ी जीत हासिल की। इस मोर्च को मुकाबले में बनाए रखने के लिए वीपी सिंह ने दूसरे नेताओं के साथ परेड ब्रिगेड ग्राउंड पर एक बड़ी रैली की। यह रैली राजनीतिक समभाव की मिसाल थी, क्योंकि उस दौरान विरोधी विचारधाराओं का मेल हुआ था।

इसी मैदान से हुआ ममता का उदय

1980 और 90 के दशक में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का राजनीतिक कद बढ़ना शुरू हुआ था। उस वक्त उनकी पहचान कांग्रेस थी। दरअसल, 25 नवंबर 1992 को ब्रिगेड परेड मैदान पर एक रैली हुई, जिसकी मुख्य संयोजक ममता बनर्जी थीं। कांग्रेस ने सीपीएम के खिलाफ ममता को चेहरा बनाया। ममता का नाद ब्रिगेड परेड मैदान में गूंजा और वह बंगाल में वाम दलों का काल बन गईं, लेकिन इसका शिकार कांग्रेस भी हुई। ममता बनर्जी ने नारा दिया था कि बदला नहीं, बदलाव चाहिए। अब वह बदलाव हुआ या नहीं, यह तो बंगाल की जनता 27 मार्च से शुरू होने वाले विधानसभा चुनावों में तय करेगी और उसका नतीजा 2 मई को आएगा।

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