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पितृपक्ष में ‘मोक्षस्थली’ गया में नहीं होगा मेले जैसा आयोजन, श्रद्धालु कर सकेंगे पिंडदान


गया:- पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए पितृपक्ष में पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा काफी पुरानी है। देश के कई स्थानों में पितरों को श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से पुरखों को मोक्ष प्रदान किया जाता है लेकिन इसमें सर्वोत्तम स्थान गया को माना जाता है। यही कारण है कि गया को ‘मोक्षस्थली’ भी कहा जाता है। कोरोना को लेकर लगातार दूसरे साल पितृपक्ष मेले का आयोजन नहीं हो रहा है, लेकिन इस साल पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए पिंडदान के लिए श्रद्धालु जुटेंगे। इस साल पितृपक्ष 20 सितंबर से शुरू होगा। त्रिपाक्षिक गया श्राद्ध करने वाले 19 सितंबर को पुनपुन या गया शहर में स्थित गोदावरी तालाब से पिंडदान शुरू करेंगे। 20 सितंबर को फल्गु में पूर्णिया श्राद्ध होगा। तीर्थवृत सुधारिनी सभा के अध्यक्ष गजाधर लाल बताते हैं कि 17 दिनी पिंडदान (त्रिपाक्षिक गयाश्राद्ध) 19 सितंबर से 7 अक्टूबर तक होगा। 7 अक्टूबर को सुफल के साथ त्रिपाक्षिक श्राद्ध संपन्न हो जाएगा। उन्होंने बताया कि इस बार श्रद्धालु पिंडदान के लिए आएंगे, लेकिन उन्हें कोरोना प्रोटोकॉल का पूरा पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि इसकी जानकारी श्रद्धालुओं को पंडों द्वारा भी उपलब्ध कराई जा रही है। विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के कार्यकारी अध्यक्ष शंभूलाल विट्ठल ने बताया कि कोरोना को देखते हुए इस बार पितृपक्ष मेला का आयोजन नहीं किया गया है लेकिन जो पिंडदानी आ रहे हैं वह पिंडदान कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि हम लोग भी इसके लिए कोरोना प्रोटोकॉल के तहत पूरा ख्याल रखेंगे। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि सुरक्षा व्यवस्था और साफ-सफाई के बारे में हम लोग जिला प्रशासन से मांग की है। जिला प्रशासन द्वारा राज्य के अंदर और बिहार के बाहर एवं अन्य देशों के श्रद्धालुओं से अनुरोध किया गया है कि अगर संभव हो तो कोरोना संक्रमण के कारण पितृ तर्पण के लिए गया नहीं आए। अगर लोग आ भी रहे हैं तो लोगों को बड़े समूह में आने पर प्रतिबंध रहेगा, वहीं बाहर से आने वाले लोगों के लिए कोरोना जांच अनिवार्य होगा तथा जिन्होंने कोरोना का टीका नहीं लिया है, उन्हें कोरोना का टीका दिया जाएगा। पितरों की मुक्ति का प्रथम और मुख्यद्वार कहे जाने की वजह से गया में पिंडदान का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष को शुभ कामों के लिए वर्जित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म कर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की सोलह पीढ़ियों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिल जाती है। आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष श्राद्ध या महालया पक्ष कहलाता है। ऐसे तो देश के कई स्थानों में पिंडदान किया जाता है, मगर बिहार के फल्गु तट पर बसे गया में पिंडदान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

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