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इस गांव में शादी के लिए बेटी देने से डरते हैं लोग

बीमार होने पर खटिया में लिटा कर 5 किलोमीटर चलना पड़ता है पैदल
पूर्ण ओडीएफ,उज्ज्वला गैस कनेक्शन और पीएम आवास योजना की सच्चाई का पोल खोलता है कतारीबेड़ा गांव
रांची:- जंगल और पहाड़ों से घिरे इस गांव की तस्वीर को देखकर आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि यह झारखंड के किसी सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र का हिस्सा होगा लेकिन आपकी यह सोच गलत साबित हो सकती है। यह तस्वीर राजधानी रांची से करीब 25 किलोमीटर दूर कांके प्रखंड के ऊपरी कोनकी पंचायत अंतर्गत कतारीबेड़ा गांव की है। आजादी के करीब 74 वर्ष बाद भी इस गांव का संपर्क बरसात के मौसम में राज्य के अन्य हिस्सों से कट जाता है। कलकल बहती यह नदी भले ही कतारी बेड़ा गांव के लिए जीवनदायिनी होगी लेकिन कई मौके पर यह लोगों के लिए एक बड़ी समस्या भी बन जाती है। गांव पहुंचने के लिए पुल और सड़क मार्ग के अभाव के कारण लोग इस गांव में अपनी बेटी का ब्याह भी नहीं करना चाहते।
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से भले ही यह दावा किया जाता हो कि झारखंड पूरी तरह से ओडीएफ हो चुका है, लेकिन शौचालय निर्माण का यह अधूरा पड़ा ढांचा यह बताने के लिए काफी होगा कि राज्य के लोग अभी खुले में शौच के लिए मजबूर है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 3 वर्ष पहले शौचालय निर्माण कराने का भरोसा दिलाया गया था लेकिन यह अब तक पूरा नहीं हो पाया है।
सरकार की ओर से यह भी दावा किया जाता है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत हर घर में रसोई गैस कनेक्शन उपलब्ध करा दी गई है और हाल के दिनों में प्रधानमंत्री द्वारा चूल्हा भी उपलब्ध कराने की योजना की शुरुआत की गई। लेकिन माथे पर लकड़ी की गठरी रखकर घर की ओर जाती यह वृद्ध महिला सरकार के इस दावे का भी पोल खोलती है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि करीब 1500 आबादी वाले इस गांव में कुछेक घरों को छोड़कर सभी लोग लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने के लिए मजबूर हैं।
सरकार की ओर से हर गरीब परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का मकान उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिलाया जाता है लेकिन मिट्टी के इस घर के बाहर खड़ी महिला का कहना है कि आर्थिक कठिनाइयों की वजह से गांव के अधिकांश लोग इसी तरह के छत के नीचे अपना जीवन बसर कर रहे हैं।
मनरेगा बिरसा कृषि विकास योजना समेत अन्य योजनाओं के माध्यम से सरकार की ओर से हर गांव में रोजगार उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है, पर ग्रामीणों का कहना है कि गांव में ऐसी कोई भी योजना अभी नहीं चल रही है जिससे गांव में ही उन्हें रोजगार मिल सके। रोजगार की तलाश में उन्हें प्रतिदिन पैदल ही नदी पार कर 5 किलोमीटर दूर चलकर मुख्य सड़क पर जाना पड़ता है जहां से वह बस या ऑटो पकड़ कर रांची जाते हैं और उन्हें दिहाड़ी का काम मिल पाता है।
गांव में जब यह हमारी टीम पहुंची, तो एक पिता अपने छोटे बीमार बच्चे को गोद में लेकर निकटवर्ती पिठौरिया स्थित स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की तैयारी में जुटे थे। उन्होंने बताया कि गांव में सड़क और पुल नहीं रहने के कारण अक्सर लोगों के बीमार होने पर खटिया में लिटा कर या बाइक अथवा अन्य साधनों की मदद से 5 किलोमीटर दूर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है उसके बाद ही परिवहन की सुविधा मिल पाती है।
इस गांव की आर्थिक व्यवस्था सिर्फ कृषि पर ही निर्भर है। हालांकि अब कुछ लोग पशुपालन और बकरी पालन कर अपनी जीविका चलाने की कोशिश में जुटे हैं। बकरी पालन को लोग एटीएम की तरह इस्तेमाल करते हैं जब भी उन्हें पैसे की जरूरत होती है तो वह बाजार जा कर इसे बेचकर अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं।

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