May 11, 2021

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महानिष्क्रमण के पहले इसी स्टेशन पर अंतिम बार दखे गये थे नेताजी

लालू प्रसाद ने वर्ष 2009 में स्टेशन का नाम नेताजी सुभाषा चंद्र बोस गोमो जंक्शन कर दी थी श्रद्धांजलि

रांची:- भारतीय रेलवे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें नमन कर रहा है। काबुल होते हुए जापान जाने के पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस धनबाद के गोमो जंक्शन में ही अंतिम बार देखे गये थे। महानिष्क्रमण पर निकलने के लिए नेताजी ने गोमो स्टेशन से ही दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी थी। इसके बाद देश में नेताजी कभी देखे नहीं गये। नेताजी के सम्मान में रेल मंत्रालय ने वर्ष 2009 में इस स्टेशन का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो जंक्शन कर दिया। 23 जनवरी 2009 को तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद ने उनके स्मारक का यहां लोकार्पण किया किया था।
ऐतिहासिक जानकारों के मुताबिक 17-18 जनवरी 1941 की रात के समय कार से नेताजी अपने भतीजे डॉ. शिशिर बोस के साथ धनबाद के गोमो स्टेशन पहुंचे थे। अंग्रेजी फौजों और जासूसों से नजर बचाकर गोमो हटियाटाड़ के घने जंगल में नेताजी छिपे रहे। यहां जंगल में ही स्वतंत्रता सेनानी अलीजान और वकील चिरंजीव बाबू के साथ एक गुप्त बैठक की थी। बैठक के बाद वकील चिरंजीवी बाबू और अलीजान ने गोमो के ही लोको बाजार स्थित कबीलेवालों की बस्ती में नेताजी को ले गए। यहां उनको एक घर में छिपा दिया था। रात भर नेताजी यहां रहे। 18 जनवरी 1941 की रात दोनों साथियों ने इसी गोमो स्टेशन से उनको कालका मेल से दिल्ली रवाना किया था। इसलिए गोमो का नाम नेताजी सुभाष चंद बोस जंक्शन रखा गया। इसके बाद से अब प्रत्येक वर्ष प्रत्येक वर्ष 17-18 जनवरी को मध्यरात्रि निष्क्रमण दिवस स्टेशन परिसर में मनाया जाता है।
धनबाद से नेताजी का गहरा नाता रहा है। नेताजी का वर्ष 1930 से 1941 के बीच कई बार धनबाद आगमन हुआ था। नेताजी ने धनबाद में 1930 में देश की पहली रजिस्टर्ड मजदूर यूनियन कोल माइनर्स टाटा कोलियरी मजदूर संगठन की स्थापना की थी। नेताजी स्वयं इसके अध्यक्ष थे। यहीं से देश को आजाद कराने को आजाद हिंद फौज का सपना पूरा करने की दिशा में नेताजी ने मजदूरों को एकजुट कर कदम बढ़ाए थे।
इधर, रेलवे की ओर से ऐतिहासिक हावड़ा-कालका मेल का नाम बदलकर ‘‘नेताजी एक्सप्रेस’’ किया गया है, हावड़ा-कालका मेल भारतीय रेलवे नेटवर्क की उन सबसे पुरानी ट्रेनों में एक है, जो अभी भी पटरियों पर दौड़ रही है। यह ट्रेन पहली बार 1866 में चली थी यानी ये रेलगाड़ी 150 साल से देश की सेवा कर रही है।

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