March 5, 2021

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राष्ट्रवाद, साहस और त्याग की मूर्ति है नेताजी : नायडू

नयी दिल्ली:- उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने का स्वागत करते हुए कहा है कि राष्ट्रवाद, साहस और त्याग की प्रतिमूर्ति है। श्री नायडू ने शनिवार को सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर लिखें एक लेख में कहा कि सरकार ने नेता जी की जन्म जयंती को देश भर में ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया है। उन्होंने कहा, “ मैं इस निर्णय का स्वागत करता हूं। एक अदम्य शौर्यवान नायक को जिसका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम सब जानते हैं कि नेताजी विलक्षण प्रतिभा वाले साहसी नेता थे, जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष में कोई कसर बाकी नहीं रखी। उनके समकालीन इतिहास और उनके स्वयं के जीवन वृत्त का अध्ययन करें तो पता चलता है कि राष्ट्रवाद से प्रेरित, भारत को विदेशी शासन की बेड़ियों से मुक्त कराने के जुनून से ओतप्रोत, नेताजी में नेतृत्व का स्वाभाविक गुण था।” श्री नायडू ने ‘जय हिन्द’ के नारे का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘जय हिन्द’ रोजमर्रा का यह अभिवादन हमारी अतःचेतना में रचा बसा है। कभी सोचा किसने इसे इतना प्रचलित कर दिया कि ये फौरन ही आपमें एक ऊर्जा, आवेश भर देता है, अपनी मातृभूमि के लिए आपके कर्तव्य भाव को जगा देता है, राष्ट्रवाद की तीव्र भावना जगा देता है। श्री नायडू ने नेताजी के जीवन के विभिन्न आयामों, घटनाओं और कथनों का उल्लेख करते हुए कहा कि नेताजी उत्कृष्ट राष्ट्रप्रेम, नि:स्वार्थ राष्ट्र सेवा, एक बड़े लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण, प्रतिकूल परिस्थिति में अदम्य साहस जैसे उदात्त उदार गुणों की प्रतिमूर्ति थे। वे देश के भविष्य के प्रति आशावादी दृष्टि रखने वाले एक करिश्माई नेता थे। नेता जी भारतवासियों की पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे और देशवासियों में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और प्रेम की प्रेरणा देते रहेंगे। उपराष्ट्रपति ने लिखा, “ वे थे भारत के मूर्धन्य क्रांति योद्धा, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, जिन्होंने इस नारे को हमारा राष्ट्रीय अभिवादन बना कर उसे राष्ट्रवाद का अमर मंत्र बना दिया। आज नेता जी की जन्म जयंती पर, देश के उस महान नायक की स्मृति को भावपूर्ण प्रणाम करता हूं जिन्होंने मातृभूमि को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराने में अद्भुत भूमिका निभाई।”
श्री नायडू ने नेताजी के आरंभिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वह किशोरावस्था में ही स्वामी विवेकानंद तथा श्री अरविन्द से बहुत प्रभावित रहे। नेताजी एक मेधावी छात्र थे और पढ़ाई लिखाई में सदैव अव्वल रहे। उनके मन में सिविल सेवा में शामिल होने को ले कर दुविधा बनी रही. अंततः उन्होंने फैसला कर लिया और सिविल सेवा छोड़ दी।
उन्होंने कहा कि अप्रतिम व्यक्तित्व के धनी नेताजी देश की आज़ादी के लिए अपने संकल्प के कारण युवाओं के आदर्श और अंग्रेज़ों के लिए खतरा बन गये. नेताजी का विश्वास था कि अंग्रेज़ों को भागने के लिए एक राष्ट्रीय सेना की ज़रूरत होगी। उन्होंने एक बार कहा भी था , “ स्वतन्त्रता संघर्ष के लिए और स्वाधीनता मिलने के बाद उसे सुरक्षित बचाए रखने के लिए, भारत को एक राष्ट्रीय सेना की ज़रूरत होगी जो अनुशासन, प्रशिक्षण और हथियारों , उपकरणों में विश्व की सबसे सफल और आधुनिक सेनाओं के समकक्ष हो। ” बर्लिन पहुंच कर उन्होंने जर्मन सरकार को अपनी योजना बताई और जर्मनी में भारतीय युद्ध बंदियों को संगठित करने लगे। श्री नायडू ने लिखा, “ सितम्बर 1941 में मात्र 12 लोगों से आरंभ कर, उन्होंने अगस्त 1942 तक लगभग साल भर में 2000 सैनिकों की सेना संगठित कर ली। यह तथ्य अपने आप में उनकी प्रेरक नेतृत्व क्षमता का परिचायक है। रेडियो पर उनके नियमित भाषण और उनके पत्र ‘आज़ाद हिन्द’ हजारों भारतीयों के हृदय में राष्ट्रवाद की लौ जगाने लगे। सम्मान स्वरूप, बर्लिन के भारतीय सिपाहियों ने बोस को ‘नेता जी’ की उपाधि दी।” नेताजी के विदेश प्रवास का उल्लेख करते हुए श्री नायडू ने कहा कि विदेश में अपने प्रवास के दौरान नेता जी ने जर्मनी, जापान, इटली जैसे अनेक सहयोगी बनाए। एक बार नेता जी ने रास बिहारी बोस को बताया भी था कि “अपने अठारह महीनों के विदेश प्रवास के दौरान मैंने अनुभव किया कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई में जर्मनी, जापान और इटली हमारे सहयोगी हैं। लेकिन स्वयं भारतीयों को ही भारत की आज़ादी अर्जित करनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि नेता जी अपने अगल बगल सत्ताधारी लोगों और सरकारों के होते हुए भी, अपने मार्ग से विचलित हुए बिना अपने लक्ष्य के प्रति सदैव स्पष्ट और सजग रहे।

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