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नृत्य कला के आदि प्रवर्तक हैं नटराज शिव

मनातू:- भारतीय अध्यात्म में नटराज शिव की मान्यता केवल नृत्य कला के प्रवर्तक के रूप में ही नहीं अपितु अज्ञानता के नाश का भी द्योतक है।
अपने तांडव रूप में वे अपस्मार दानव पर नृत्य करते हुए दिखाई पड़ते हैं उनके पांवों से दबा यह दानव, अज्ञानता का प्रतीक है। यह भंगिमा अज्ञानता का समूल नाश कर ज्ञान के आनन्द प्राप्ति की ओर इंगिति है।
नृत्य मुद्रा में ही उनके बाएं हाथ में अग्नि की लपटें दिखाई पड़ती हैं जो विनाश की प्रवृति है। शिव संहारक एवं सर्जक भी हैं इसलिए अपनी अग्नि से सृष्टि की नकारात्मकता को नष्ट करते हुए नवनिर्माण का रास्ता प्रशस्त करते हैं।
नृत्य मुद्रा में उनका उठा हुआ एक पैर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। उनका एक हाथ नीचे की ओर उन्मुख है जो स्थिति और लय को प्रदर्शित करता है। सृष्टि गतिमान और परिवर्तनशील है। यहां नित्य परिवर्तन, सृजन एवं संहार होते रहते है जो अनवरत चलता है।
निसंदेह भगवान शिव का यह अविराम महानृत्य सृष्टि के आवरणों को हटाकर हमें अपूर्व रहस्य से परिचित कराता है।
सौजन्य: आओ चलें शिव कि ओर

प्रस्तुति: मौआर पंकजजीत सिंह

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