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नवरात्र में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पूजन हवन में कनेर के फूलों की होती है आहूति


देवघर:- बाबा मंदिर दुनिया का एक मात्र ऐसा धाम है, जहां ज्योतिर्लिंग यानी शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं। नवरात्र में यहां पूजा पद्धति भी अन्य तीर्थस्थल से अलग होती है। शिव और शक्ति की पूजा साथ-साथ होती है। प्राचीन काल से यह परंपरा चली आ रही है। बाबा मंदिर प्रांगण में हवन कुंड है। दुर्गा पूजा के समय यहां मां का आह्वान कर नवरात्र के पहले दिन से नवमी तक हवन होता है। खास बात ये कि हर दिन लाल कनेल (कनेर) के फूल को घी में डुबोकर हवन कुंड में आहुति दी जाती है। नौ दिन में 10 हजार कनेल के फूलों से आहुति देने की परंपरा है। हर दिन हवन समाप्त होने पर पुजारी सीधे बाबा मंदिर के गर्भ गृह जाते हैं। तब पूजाअर्चना रोक दी जाती है। शिवलिंग को जल से स्नान करा हवन कुंड से साथ ले गए एक कटोरा घी का बाबा पर अर्पण किया जाता है। एक ही पुजारी नवरात्र भर सुबह बाबा की प्रातःकालीन पूजा व हवन करते है। दोपहर में घी का भोग लगाते हैं।शाम में पूजा करते हैं। तब अन्न और जल ग्रहण करते हैं। जब तक पूजा संपन्न नहीं होती, वह निर्जला रहते हैं। देवघर शक्तिपीठ है। नवरात्र के समय शक्ति की आराधना होती है तो शिव भी साथ में पूजे जाते हैं। पिछले साल नवरात्र में कनेल का फूल नहीं मिला तो बेल पत्र से आहुति दी गई। मंदिर के स्टेट पुरोहित श्रीनाथ महाराज कहते हैं कि शास्त्र में स्पष्ट है कि यदि कनेल का फूल नहीं मिले तो विल्व पत्र, वह भी न मिले तो तिल से हवन किया जाता है। बाबा मंदिर के हवन कुंड में कनेर के पुष्प व घी से हवन की परंपरा 17 वीं शताब्दी के बाद से चल रही है। 1929 से 1971 के बीच मंदिर के सरदार पंडा भवप्रीता नंद ओझा थे। उनके समय में दो बार ऐसा हुआ जब अत्यधिक बारिश के कारण कनेल फूल नहीं हुआ। तब विल्वपत्र से हवन की परंपरा निभाई गई।

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