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हड़प्पा-मोहनजोदड़ो के समकक्ष झारखंड की सोहराई कला को संरक्षित करने की पहल शुरू

हजारीबाग-चतरा की कई पहाड़ियों पर अवस्थित गुफा में मिलती है सोहराई कला झलक



रांची:- झारखंड की सोहराई कला को भारत सरकार से जीआई टैगिंग मिल चुकी है और इतिहास के जानकार अनुसंधानकर्त्ताओं और पुरातत्वेत्ताओं का मानना है कि यह कला हड़प्पा – मोहनजोदड़ो के समकक्ष रही होगी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में जो मोर और अन्य चित्रकला की आकृतियां मिली है, उसी तरह की आकृत्तियां हजारीबाग के बड़कागांव के इस्को गांव स्थित सती पहाड़ की गुफाओं में भी मिलती है। इन गुफाओं में मिली कलाकृत्तियों के अध्ययन से यह बात सामने आयी है कि इस भित्तीचित्र करीब 10 हजार वर्ष पुरानी है। इस निष्कर्ष के बाद विशेषज्ञों और अनुसंधानकर्त्ताओं का मानना है कि सोहराई कला भी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के समक्ष रही होगी।
हजारों-सैकड़ों साल पुरानी सोहराई कला को पहाड़ों की गुफाओं से निकाल कर गांव-गांव तक पहुंचाने और भारत सरकार से जीआई टैगिंग दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पद्मश्री बुलू इमाम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और अब उनकी बहु तथा सोहराई महिला समिति की संयोजिका अलका इमाम इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयासरत है। अलका इमाम ने बताया कि जीआई टैगिंग मिल जाने के बाद सोहराई कला का पूरे देश-दुनिया में तेजी से प्रसार-प्रचार हो सकेगा। उन्होंने बताया कि सोहराई कला में घर की दीवारों के साथ ही अब कागज में भी बनायी जाने लगी है। सदियों पुरानी इस कला में मुख्य रूप से चार रंग की मिट्टियों का प्रयोग होता है, जिसमें दूधी (सफेद) मिट्टी , काली मिट्टी, पीली मिट्टी और रेड हेमेटाइड(लाल मिट्टी) शामिल है।
अलका इमाम ने बताया कि जनजातीय क्षेत्र में सोहराई बनाने की अलग-अलग विधा प्रचलित है और प्रमुख रूप से आठ-नौ जनजातीय समाज के लोग एक-दूसरे की कला की नकल नहीं करते थे। ये प्रतिवर्ष सोहराई पर्व के मौके पर अपने घरों को इस कला के माध्यम से आकर्षक तरीके से संजाते-संवारते है और इस हूनर को अच्छी तरह से जानने वाली महिलाओं को पूरे गांव-पंचायत में सम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाता है। अब यह कला गांव की दीवारों से निकल कर शहर की चाहरदिवारी तक जा पहुंची है और देश-दुनिया में इस कला की मांग बढ़ती ही जा रही है।
अलका इमाम ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और संक्ृति के प्रचार-प्रसार में जुटी स्पिक-मैके संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में भी स्कूली बच्चों को सोहराई कला से अवगत कराया। कोविड-19 संक्रमणकाल में आयोजित इस ऑनलाइन कार्यशाला में देशभर के 15 हजार से अधिक बच्चे हिस्सा ले रहे हैं।

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