March 9, 2021

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हेमंत सोरेन की कमजोर सरकार झारखंड के लिए बहुत बड़ा खतरा: रघुवर दास

रांची:- अगर नेतृत्व कमजोर हो, अक्षम हो तो सारी मुसीबतें अपने आप पैदा होने लगती है। विकास की गति थम जाती है और सरकार किसी भी विषय पर फैसले लेने से कतराने लगती है,यह बातें पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास जी ने कही।श्री दास आज प्रदेश कार्यालय में एक प्रेसवार्ता को संबोधित कर रहे थे।

आगे श्री दास ने कहा कि कमजोर व्यवस्था में सब जगह,हर काम में अभाव ही रहता है। सर्वत्र एक ही चीज अभाव-अभाव ही नजर आता है। विकास कार्यों के लिए धन के अभाव का रोना इस सरकार की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन दिल्ली में छह लाख रुपये महीने का बंगला लेने में धन की कमी आड़े नहीं आती। कमजोर किंतु गलाबाज शासन में चारों और व्यवस्था दिखाई जाती है, लेकिन होती नहीं है।
कमजोर शासन में भू-माफिया, जंगल माफिया और खनन माफियाओं को संरक्षण दिया जाता है। जमीन, जंगल और खनिजों के अवैध कारोबारी बेखौफ होकर काम करते हैं और अपनी काली कमाई से सत्ताधीशों की तिजोरिया भरते हैं।
आगे श्री दास ने कहा कि कमजोर शासन में लोक गायब और तंत्र हावी हो जाता है। परिणामस्वरूप जनता जब मचलती है, अपने हक, सुरक्षा,जरूरतों और न्याय के लिए आवाज उठाती है तो कोलाहल पैदा होता है।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की शिकायत यह है कि जनता आंदोलन कर रही है, लेकिन आरोप तो विपक्ष पर लगाया जा रहा है।आखिर क्यों, इसका जवाब सरकारी पार्टियां नहीं देती हैं,देंगी भी कैसे, इन 13 महीनों में वे पूरी तरह बेनकाब हो गई हैं।

श्री दास ने कहा कि सवाल यह है कि इन 13 महीनों में विकास की गाड़ी ठिठक क्यों गई।राज्य में अराजकता एवं अर्थव्यवस्था के कारण पैदा हुए सोचनीय हालात,एड़ी से चोटी तक व्यवस्था में फलता-फूलता भ्रष्टाचार, महिलाओं-बच्चियों के साथ दरिंदगी, नित हो रही हत्याएं और पेशेवर अपराधियों तथा उग्रवादियों के आतंक के लिए यदि मुख्यमंत्री नहीं, तो कौन जिम्मेदार है। हकीकत है कि आज पूरे राज्य में असंतोष पसर रहा है। समाज का हर तबका पीड़ित है। शासन से लोगों का भरोसा टूट रहा है।
हेमंत सोरेन से जो आशा-अपेक्षा थी,वह सूख रही है। जनता स्वयं को ठगा-छला महसूस कर रही है।* आगे श्री दास ने कहा कि 13 महीनों की इस सरकार की कारस्तानियों की आलम यह है कि इस सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में पत्थलगड़ी कांड के आरोपियों पर से बिना जांच-पड़ताल केस वापस ले लिया। इससे राष्ट्रविरोधी शक्तियों, उग्रवादियों, अपराधियों का मनोबल बढ़ गया और वे पूरे राज्य में तांडव मचाने लगे। यहां तक कि सांवैधानिक प्रमुख राज्यपाल के आवास की दीवारों पर दहशतगर्दी के पोस्टर चिपकाने लगे। ऐसा पिछले बीस साल में कभी नहीं हुआ।उन्होंने कहा कि अपराधियों, उग्रवादियों व राष्ट्र विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ाने का ही परिणाम था कि चाईबासा। वहां सात लोगों की नृशंस हत्या कर दी गई थी। उस पर तुर्रा यह कि बकौल मुख्यमंत्री जो मारे गए थे वह भी तो उनके ही थे, जिन्होंने मारा था, वे भी उन्हीं के थे। इसलिए कोई कार्यवाही तो होनी नहीं थी, हुई भी नहीं। दिखावे के लिए कमेटी बना दी गई। कमेटी की जांच का क्या हुआ, क्या कार्रवाई हुई, किसी को पता नहीं। आखिर जब मुख्यमंत्री के लोग मुख्यमंत्री के लोगों की हत्या करेंगे तो करवाई नहीं होगी। क्या मुख्यमंत्री बताएंगे कि इस राज्य के कौन से नागरिक उनके हैं और कौन पराये। क्या किसी राज्य का मुखिया इस आधार पर निर्णय लेता है? इसी को कहते हैं – अक्षम, अराजक सरकार।

आगे श्री दास ने कहा कि अब जरा लोहरदगा दंगे पर गौर कीजिए। आम लोग नागरिकता कानून के समर्थन में जुलूस निकाल रहे थे। उन पर अचानक हमला कर दिया गया। दुकानें जला दी गई। मकानों में तोड़फोड़ की गई। बम चले, गोलियां चली। मकानों की छतों से पत्थर-ईंटे बरसायी गयीं। एक युवक की मौत हो गई। कई घायल हो गए। कर्फ्यू लगा। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। शायद उपद्रवी, मुख्यमंत्री और उनके एक मंत्री के लोग थे। जिस राज्य के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को भी दंगाई रौंद डाले, प्रदर्शनकारियों को लहूलुहान कर डाले तथा सरकार बगले झांकने लगे। तब भी क्या सरकार पर अक्षम और पक्षपाती होने का आरोप चस्पा नहीं होता है?
आगे उन्होंने कहा कि पिछली सरकार की एक महत्वकांक्षी योजना थी रेडी टू ईट। इस योजना का मकसद गांव-देहात के गरीब बच्चों को पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराना था। इस योजना का कार्यान्वयन सखी मंडलों (सेल्फ हेल्प ग्रुप) के माध्यम से होना था। इस पर 500 करोड़ रुपए खर्च होने थे। लेकिन सरकार ने यह कहते हुए इसे बंद कर दिया था कि इसका कार्यान्वयन फिलहाल असंभव है। सरकार अपने कैबिनेट संलेख में मानती है कि यह योजना बहुत अच्छी है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। कुपोषण भी दूर होगा, लेकिन सरकार अपने बूते इसका कार्यान्वयन नहीं कर पाएगी। लिहाजा इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी जानी चाहिए। इससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं मानती है की वह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं के कार्यान्वयन में अक्षम है। वह गांव स्तर पर आटा पीसने-गुथने की छोटी सी मशीन तक नहीं लगवा सकती। अब टेंडर की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। और चर्चा यह है कि टेंडर उसी को मिलने वाला है, जो अंडमान निकोबार से मजदूरों को हवाई जहाज से झारखंड लाया था।

आगे श्री दास ने कहा कि इस सरकार के लिए सबसे बड़ी परेशानी कांग्रेस है। कांग्रेस के एकमात्र ऐसी पार्टी है जो सरकार के अंदर रहे या बाहर से समर्थन करें, जबरदस्त वसूली करती है। मधु कोड़ा के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस ने कैसे और कितना मधु चाटा तथा कोड़ा किन-किन लोगों पर पड़ा और पड़ रहा है, पूरा झारखंड जानता है। तब कांग्रेस की प्रभारी नूर बानो थी। अपने हर झारखंड दौरे पर वह इतना नूर-कोहिनूर बटोर कर ले जाती थीं, यह सर्वविदित है। अब आरपीएन सिंह है, जिनपर कांग्रेस के ही एक बड़े नेता फुरकान अंसारी ने खुलेआम आरोप लगाया कि वह अपने मंत्रियों के माध्यम से वसूली करते हैं। मुख्यमंत्री के वर्तमान दिल्ली दौरे को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वह कांग्रेस नेताओं से शिष्टाचार भेंट करने के लिए गये थे। लेकिन शिष्टाचार भेंट के लिए चार्टर्ड प्लेन से जाने की क्या जरूरत थी, वह भी तब जब वे कहते हैं कि खजाना खाली है। दरअसल कांग्रेस को अगले चार महीनों में पांच राज्यों में चुनाव लड़ना है और इसके लिए झारखंड से कुछ मोचन-दोहन वह नहीं करेगी, ऐसा कैसे हो सकता है।
उन्होंने कहा कि हमेशा खजाना खाली होने की बात कहने वाले हेमंत सोरेन जी यह बताने का कष्ट करेंगे कि नयी दिल्ली में एन.आर.आई इनवेस्टमेंट सेल के नाम पर छह लाख रूपये प्रति माह में एक बंगला 5/1, आनंद निकेतन, नयी दिल्ली क्यों बुक किया गया है। झारखंड भवन में सारी सुविधाएं होने के बावजूद हेमंत सोरेन जब भी नयी दिल्ली की यात्रा पर रहते हैं अपनी सुविधा के लिए यहां क्यों ठहरते हैं। जनता की गाढ़ी कमाई इस पर उड़ाई जा रही है।

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