January 16, 2021

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राजनीतिक विरासत को संवार हेमंत सोरेन ने बनायी अपनी अलग पहचान

रांची:- झारखंड मुक्ति मोर्चा, जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन ने पिता से मिले राजनीतिक विरासत को संवार कर झारखंड की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की।
झारखंड की राजनीति की शीर्ष पर पहुंचने वाले हेमंत सोरेन कभी मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते थे। इंटरमीडिएट की पढ़ाई पटना हाईस्कूल से पूरा करने के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग करने के लिए बीआईटी मेसरा में नामांकन भी लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़ कर राजनीति में कूदना पड़ा।
10अगस्त 1975 को रामगढ़ के गोला प्रखंड के नेमरा में जन्मे हेमंत सोरेन ने संगठन के अंदर तमाम विरोधियों को अपने रण-कौशल से या तो किनारे लगा दिया, अथवा अपने पीछे चलने पर मजबूर कर दिया। आज संगठन में उनकी मजबूत पकड़ के कारण उनके करीबी हेमंत सोरेन को ‘वन मैन आर्मी’ कहते है। शिबू सोरेन के दूसरे पुत्र हेमंत सोरेन ने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत में अपने बड़े भाई दुर्गा सोरेन के सान्निध्य में राजनीति का ककहरा सीखा, लेकिन उनके असामयिक मौत के बाद संगठन की बड़ी जवाबदेही हेमंत सोरेन के कंधे पर आ गयी। घर की परिस्थितियों की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गयी।
2003 में उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2003 में राजनीति में पदार्पण करते हुए वे झारखंड छात्र मोर्चा के अध्यक्ष बने हेमंत ने पहली बार 2005 में दुमका विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था हालांकि वह पार्टी से बगावत कर मैदान में उतरी स्टीफन मरांडी से हार गए । 24 जनवरी, 2009 से लेकर 4 जनवरी 2010 तक थोड़े वक्त के लिए हेमंत राज्यसभा के भी सदस्य रहे और फिर पहली बार 23 दिसंबर 2009 को दुमका से वर्तमान विधानसभा के लिए विधायक चुने गए। 11 सितंबर 2010 को राज्य में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में बनी सरकार में हेमंत को उपमुख्यमंत्री का पद मिला। हालांकि जनवरी 2013 को झामुमो की समर्थन वापसी के चलते बीजेपी के नेतृत्व वाली अर्जुन मुंडा की गठबंधन सरकार गिरी थी। 13 जुलाई 2013 को हेमंत सोरेन ने झारखंड के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। 2013 में वह राज्य के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने और दिसंबर 2014 तक इस पद पर रहे। वर्ष 2014 के चुनाव में उन्हें दुमका में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन बरहेट से चुनाव जीतने में सफल रहे। जबकि 2019 में उन्हें दुमका और बरहेट दोनों ही सीटों पर जीत मिली और मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। बाद में उन्होंने दुमका से त्यागपत्र दे दिया।

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