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कोराना महामारी से निपटने में जुटी सरकार ,कालाजार जैसी बीमारियां के चुपके से पांव पसारने की आशंका


वर्ष 2021 में कालाजार उन्मूलन का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल
रांची:- देश और दुनिया इस समय कोरोना महामारी से निपटने में जुटा है, वहीं कुछ ऐसी बीमारियां भी है, जो झारखंड के संताल परगना प्रमंडल के चार जिलों साहेबगंज, गोड्डा, दुमका और पाकुड़ जिले जिले में पैर पसार रही है। ऐसी ही एक खतरनाक बीमारियों में कालाजार की बीमारी भी शामिल है। सरकार ने वर्ष 2021 तक कालाजार उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन हाल ही में कालाजार पीड़ित कुछ मरीजों की मौत से स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गयी है, लेकिन वैश्विक महामारी कोरोना के कारण कालाजार जैसी गंभीर बीमारियां इन दिनों मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पा रही है।
कालाजार रोगियों की संख्या में 22 प्रतिशत की कमी
हालांकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता का कहना है कि वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2020 में कालाजार रोगियों की संख्या में 22 प्रतिशत की कमी है। साथ ही वर्ष 2020 में 21 प्रखंडों में प्रति दस हजार जनसंख्या पर एक से कम रोगी पाये गये हैं। जबकि चालू वित्तीय वर्ष में शेष 17 प्रखंडों में कालाजार रोगियों की संख्या में प्रति दस हजार जनसंख्या पर 1 से कम रोगी लाये जाने की योजना पर तेजी से काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण चुनौतियां बढ़ी है, लेकिन सरकार अन्य गंभीर बीमारियों से निपटने की दिशा में भी लगातार प्रत्यनशील है।
संक्रमित मादा बालू मक्खी से कालाजार का फैलाव
विशेषज्ञों का कहना है कि कालाजार वेक्टर जनित रोग है, जो संक्रमित मादा बालू मक्खी से होता है। इस बीमारी का मुख्य लक्षण है कि रोगी को 15 दिनों से अधिक बुखार रहता है और इस दौरान उसे भूख नहीं लगती है और लगातार वजन में कमी आती रहती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से बालू मक्खी के संक्रमण को रोकने के लिए दस हजार की आबादी पर इंटरनल रेसीडुएल नामक दवा का छिड़काव किया जाता है। चालू वित्तीय वर्ष में भी लगभग 30 लाख जनसंख्या वाले क्षेत्र में कीटनाशी का छिड़काव किया जाना है, ताकि कालाजार की बीमारी से लोगों को बचाया जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि संताल परगना प्रमंडल के चार जिलों में कालाजार फैलने का मुख्य कारण यहां रहने वाले अधिकांश आदिवासी परिवारों का घर कच्चे मिट्टी का होना है, जिससे घरों में नमी होती और अंधेरा छाया रहता है। ऐसी ही जगहों पर कालाजार की बीमारी फैलाने वाली बालू मक्खी पनपती है ।इससे बचाव के लिए साल में दो बार कीटनाशी का छिड़काव जरुरी है, लेकिन आदिवासी समाज के लोग जनकारी के अभाव में और आर्थिक परेशानियों की वजह से ऐसा नहीं कर पाते है। वहीं स्वास्थ्य विभाग भी कालाजार से हाल के दिनों किसी मौत की खबर की पुष्टि नहीं करता है। विभागीय अधिकारियों से कहना है कि कालाजार पीड़ित जिन लोगों की मौत की बात कही जा रही है, उनकी मौत अन्य बीमारियों से हुई है।

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