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लकड़ी से बनी इन हस्तनिर्मित कलाकृतियों में मिलती है झारखंड की जीवन शैली और ग्रामीण परंपरा की झलक

रांची:- आदमी के अन्दर जो खासियत होती है, वही कला है और आदिवासी बहुल झारखंड के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई लोग सदियों पुरानी अपनी कला को संभालने और उसे समृद्ध बनाने के प्रयास में जुटे हैं।
लकड़ी के इन छोटे-छोटे टुकड़ों में अपनी कला के माध्यम से जान फूंकते विशेश्वर बिरजिया ना सिर्फ परंपरागत कला की समृद्ध विरासत को संभालने और विकसित करने में लगे है, बल्कि इसके माध्यम से वह अपने परिवार की आजीविका को भी बेहतर तरीके से चलाने में सफल हो रहे है।
झारखंड की राजधानी रांची से करीब 40 किमी दूर अनगड़ा प्रखंड के जोन्हा में रहने वाले विशेश्वर बिरजिया लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों से खिलौना, पेड़-पौधे की आकृति, बैलगाड़ी, हल-बैल, नाव, पेन स्टैड, मोबाइल और टैब स्टैंड समेत अन्य आकर्षण कलाकृतियां बनाते है।
आदिम जनजाति समुदाय से आने वाले विशेश्वर ने यह कला अपने पूर्वजों से सीखी है और उनकी इस सुंदर कलाकृति की प्रशंसा सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले पर्यटक भी करते हैं। पुणे से अपने परिवार के साथ झारखंड घूमने आयी अप्रीन अंजुम का कहना कि महाराष्ट्र में भी ऐसी हस्तनिर्मित कलाकृतियां काफी ऊंची दामों में मिलती हैं, लेकिन यहां अच्छी कलाकृतियां उनके बजट के अनुसार मिल रही हैं।
रांची स्थित सीआरपीएफ कैंप में कार्यरत अनीष मिंज का मानना है कि लकड़ी की मदद से सादगी से इस तरह की कलाकृतियां बनाना अपने आप में अद्भूत है। इन कलाकृतियों में झारखंड की जीवन शैली और ग्रामीण परंपरा की झलक मिलती ही है, साथ ही मोबाइल स्टैंड जैसी समकालीन समाज की जरुरत की वस्तुएं भी मिलती हैं।

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