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बाहर से आये लोगों को नेतृत्व सौंपने से पुराने और समर्पित कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं में रोष


गैर आदिवासी को नेतृत्व सौंपे जाने से जनजातीय नेताओं में पनपने लगा है असंतोष
रांची:- झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर और चार कार्यकारी अध्यक्षों गीता कोड़ा, को संगठन की बागडोर सौंपने के खिलाफ पुराने और समर्पित पार्टी कार्यकर्त्ताओं के अंदर रोष पनपने लगा है और यह असंतोष की चिंगारी कभी भी तेज हो सकती है।
कांग्रेस नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और चारों कार्यकारी अध्यक्ष दूसरे दल से आये है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने कांग्रेस के खिलाफ एनसीपी टिकट पर चुनाव भी लड़ा था और उन्हें करीब 11 सौ वोट प्राप्त हुए थे। हालांकि राजेश ठाकुर के समर्थकों का यह कहना है कि वे पूर्व में एनएसयूआई और युवा कांग्रेस में भी रह चुके है, लेकिन इसके बावजूद कभी वे एनएसयूआई और युवा कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष या अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रहे। उनके भाग्य का सितारा दिल्ली में प्रदेश प्रभारी के पद पर आरपीएन सिंह के आने के बाद खुला। आरपीएन सिंह ने ही उन्हें पहले कार्यकारी अध्यक्ष और अब प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व को फीडबैक देकर आवश्यक भूमिका तैयार की।
वहीं कार्यकारी अध्यक्ष सह सांसद गीता कोड़ा का भी राजनीतिक पृष्ठभूमि जयभारत समानता पार्टी से रहा है और इसी टिकट पर वह जगरनाथपुर सीट से विधयाक भी रह चुकी है। उनके पति मधु कोड़ा को भी इन्हीं सब कारणों से अब तक कांग्रेस में जगह नहीं मिल पायी है। वहीं जलेश्वर महतो जदयू के प्रदेश अध्यक्ष भी लंबे समय तक रहे और पिछले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हुए थे। विधायक बंधु तिर्की ने भी पिछला चुनाव झारखंड विकास मोर्चा टिकट पर जीता है और अभी भी उनके खिलाफ स्पीकर के न्यायाधीकरण में दलबदल का मामला चल रहा है। जबकि शहजादा अनवर की भी इन्ट्री दूसरे दल से हुई है।
दूसरी तरफ प्रदेश के आदिवासी नेताओं में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि डॉ0 रामेश्वर उरांव को बिना किसी ठोस कारण के पद से हटाकर एक गैर आदिवासी को प्रदेश अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया गया है, जबकि अलग झारखंड राज्य ही नहीं, बल्कि एकीकृत बिहार में भी छोटानागपुर-संतालपरगना क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर आदिवासी समुदाय के नेता को ही जिम्मेवारी मिलती रही है, हालांकि बीच में एक-डेढ़ वर्ष के लिए डॉ0 अजय कुमार प्रदेश अध्यक्ष बने थे, लेकिन राज्य में आदिवासी बाहुल्य आबादी को ध्यान में रखते हुए फिर से एक जनजातीय नेता के तौर पर डॉ0 रामेश्वर उरांव को यह जिम्मेवारी सौंपी गयी थी। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भी इसी कारण राज्य में एसटी के लिए सुरक्षित 21 में से सिर्फ 2 सीटों पर ही भाजपा को जीत मिली, शेष सभी सीटों पर कांग्रेस-जेएमएम की जीत हुई। पिछले चुनाव में गैर आदिवासी नेता रघुवर दास के हाथों में बागडोर रहने के कारण भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा और राज्य में बीजेपी के सत्ता से बाहर होने में भी यह एक प्रमुख कारण रहा। पार्टी के एक बड़े तबके का मानना है कि अब इसी तरह की गलती फिर से कांग्रेस से दुहराने जा रही है।

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