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वर्ष 1883 में दुर्गाबाड़ी से शुरू हुई दुर्गा पूजा महोत्सव


रांची:- राजधानी में दुर्गापूजा पूरी श्रद्धा व आस्था के साथ मनाया जा रहा है। कोरोना के मद्देनजर प्रशासनिक गाइडलाइन को देखते हुए इस वर्ष बड़े पंडाल तो देखने को नहीं मिल रहे हैं। लेकिन दुर्गापूजा कमीटियों ने प्रशासनिक निदेर्शों का पालन करते हुए भव्यता दिखाने से गुरेज भी नहीं किया है। आधुनिकता व भव्यता के इस दौर में दुर्गा बाड़ी एक ऐसा मंदिर है। जहां आज भी मां दुर्गा की आराधना पुराने और पौराणिक परंपराओं से ही की जाती है। 139 साल पुराने दुगार्बाड़ी में 1883 से जो परंपरा इस मंदिर में चली आ रही है। वह आज भी कायम है। आज भी मां की विदाई, डोली में ही बिठाकर की जाती है। रांची में सबसे पहले, सन 1883 में सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ था। रांची के जिला स्कूल के प्रधानाचार्य रहे, पंडित गंगाचरण वेदांत बागीस ने बंगाली समुदाय के समक्ष दुर्गा पूजा का प्रस्ताव रखा था। इन्हीं के प्रयास से रांची की पहली दुर्गा पूजा कमेटी का गठन हुआ था। आज जहां दुर्गाबाड़ी है वहां पहले एक खपड़ैल का मकान हुआ करता था। और उसी में पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था। आज वह जगह अलबर्ट एक्का चौक के समीप दुर्गाबाड़ी और दुर्गाबाटी के नाम से प्रसिद्ध है। दुर्गा बाड़ी में दशमी को होने वाला सिंदूर खेला काफी लोकप्रिय है। इस परंपरा में शामिल होने के लिए दूर-दूर से महिलाएं आती हैं। इसके अलावा दुर्गाबाड़ी में कुंवारी कन्या पूजन, संधि पूजा और संध्या आरती का भी खास महत्व है। विधिविधान के साथ हर साल मां अंबे की आराधना की जाती है।

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