April 15, 2021

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एक नयी सुबह का

शिव शिष्य परिवार की धरोहर देवाशीष नही रहे

(1953-2021)

किशनगंज:- एक लीजेंड व्यक्तित्व आज सदा-सदा के लिए कहानियों में दफन हो गया। हम बात कर रहे है बेगूसराय जिले के सदानन्दपुर निवासी देवाशीष प्रसाद सिंह की जिन्होंने इस कालखंड के प्रथम शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द जी से प्रेरणा प्राप्त कर शिव को अपना गुरु बनाया था। बात अस्सी के दशक के पूर्वार्ध की है जब मधेपुरा में हरीन्द्रानन्द जी कार्यपालक दण्डाधिकारी के रूप में पदस्थापित थे साथ ही एक चमत्कारिक व्यक्तित्व के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। देवाशीष सिंह की आध्यात्मिक यात्रा यहाँ से ही प्रारम्भ हुई जब अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से निजात पाने के उद्देश्य से हरीन्द्रानन्द जी और इनकी धर्मपत्नी दीदी नीलम आनन्द से मिले।
शिव को गुरु मानने के उपरांत इनकी समस्याएं अप्रत्याशित रूप से समाप्त होने लगीं जिससे धार्मिक-आध्यात्मिक मनोवृति के देवाशीष की श्रद्धा और विशवास शिव गुरु के प्रति द्विगुणित हो गई और लगन एवं परिश्रम से लोकमानस को उसकी जड़ता और अन्धविश्वसों के कारागार से मुक्त करने का दृढ़ संकल्प लिया तथा शिव कार्य की व्याप्ति और विस्तार में जीवन पर्यन्त लगे रहे अपने इस संकल्प को सार्थक करने के निमित्त इतने कम वयस में इन्होंने हाज़रों लोगों को शिव गुरु की यथार्थ सत्ता से अवगत कराते हुए उन्हें शिव के गुरु स्वरूप से जोड़ा।
जब शिव शिष्य परिवार को संस्थागत रुप दिया गया तब ये संगठन के संस्थापक अध्यक्ष चयनित हुए। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इन्होंने शिव शिष्य परिवार के लिए अपूर्व योगदान दिया। संघर्ष,समर्पण,अनवरत सेवाभाव के द्वारा शिव शिष्य परिवार की छवि को लोक चेतना में एक आध्यात्मिक संगठन के रूप में स्थापित किया। इनके कार्यकाल में संस्था आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित हो गई।
एक सफल अध्यक्ष के रूप में इनके गौरवशाली कार्यकाल को सदैव याद रखा जाएगा। आपका जाना संस्था को अपूरणीय क्षति है।
शिव शिष्य परिवार के इस शिल्पकार को लेखक भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुए श्रीचरणों में सादर नमन निवेदित करता है।

मौआर पंकज जीत सिंह
मनातू गढ़, पलामू।

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