April 18, 2021

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

कोयला कंपनियों पर बकाया मामले में कांग्रेस की गंदी राजनीति का हुआ पर्दाफ़ाश : महेश पोद्दार

2014 में केंद्र की यूपीए सरकार ने ठेंगा दिखाया, 2020 में भाजपा सरकार ने दी रजामंदी-250 करोड़ दिए भी

रांची:- राज्यसभा सांसद महेश पोद्दार ने कहा है कि कोयला कंपनियों पर भूमि लगान के हजारों करोड़ के बकाये के राज्य सरकार के दावे का पर्दाफ़ाश हो गया है। इस मामले में झारखण्ड सरकार में शामिल कांग्रेस की कुटिलता और भाजपा की उदारता खुलकर सामने आ गयी है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की कोयला कंपनियों पर राज्य सरकार पर बकाये की जानकारी के लिए उन्होंने केन्द्रीय कोयला मंत्री को पत्र लिखा था जिसके प्रत्युत्तर में कोयला मंत्री ने पत्र लिखकर जो जानकारी दी है उससे राज्य सरकार के एक दृ एक झूठ का खुलासा हो गया है और इसमें ख़ास तौर पर कांग्रेस की नकारात्मक भूमिका सामने आयी है। मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन यदि वाकई इस मुद्दे पर गंभीर हैं तो उन्हें अपने कैबिनेट में शामिल कांग्रेस के मत्रियों और सम्बंधित अधिकारियों से तथ्यों को छुपाने और बरगलाने के लिए जवाब तलब करना चाहिए और पूरी ईमानदारी से जनता को सच्चाई बतानी चाहिये।
श्री पोद्दार ने कहा कि उन्होंने 21 अक्टूबर 2020 को राज्य सरकार द्वारा कोयला कम्पनियों के ऊपर हजारों करोड़ रूपये बकाया होने के दावे की सत्यता जानने के लिए केन्द्रीय कोयला मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी को पत्र लिखा था, 28 जनवरी 2021 को मंत्री जी ने अंतरिम उत्तर दिया था कि मामले की जांच करायी जा रही हैद्य अंतिम रूप से 24 फरवरी 2021 को केन्द्रीय कोयला मंत्री ने जो जानकारी पत्र के माध्यम से उपलब्ध करायी है उसके मुताबिक़ यह मामला बहुत पुराना है। वर्तमान मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन से पूर्व अविभाजित बिहार की सरकार ने 1999 में और राज्य विभाजन के बाद 2002 तथा 2007 में झारखण्ड सरकार ने केंद्र के समक्ष ये मामला उठाया थाद्य 2002 में श्री बाबूलाल मरांडी भाजपा नीत सरकार के मुख्यमंत्री थे और 2007 में निर्दलीय श्री मधु कोड़ा मुख्यमंत्री थे और सरकार झामुमो, कांग्रेस और राजद के समर्थन से चल रही थी। यानि वर्तमान सरकार का यह दावा कि पहली बार राज्य की किसी सरकार ने राज्य के अधिकार की चिंता की है, झूठा है।
केन्द्रीय कोयला मंत्री श्री प्रहलाद जोशी ने अपने पत्र में एक बड़ा खुलासा भी किया है। भारत सरकार की कोयला कंपनियों पर लगान बकाये से सम्बंधित झारखण्ड सरकार के दावे को भारत सरकार के तत्कालीन कोयला मंत्री ने 6 जनवरी 2014 को सिरे से खारिज कर दिया था। भारत सरकार के तत्कालीन कोयला मंत्री ने झारखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्रांक 49029/5/2013-पीआरआईडब्ल्यू दृ प् के माध्यम से साफ़ कहा था कि दृ “ कोल बीयरिंग एक्ट यानि सीबीए अधिनियम, 1957 की धारा दृ 10 के अनुसार, धारा 9 के तहत घोषणा के सरकारी राजपत्र में प्रकाशन पर, यथास्थिति, भूमि या भूमि में या उस पर के अधिकार समस्त विल्लंगमों से मुक्त होकर आत्यांतिक रूप से केन्द्रीय सरकार में निहित होंगेद्य उपर्युक्त प्रावधानों के आधार पर, कोयला खानों या कोकिंग कोयला खानों के सम्बन्ध में केंद्र सरकार के अधिकारों का उपयोग सीबीए अधिनियम, 1957 की धारा 11 के आधार पर सरकारी कम्पनी द्वारा किया जाता हैद्य चूंकि न तो केंद्र सरकार और न ही सरकारी कम्पनी, जिनमें केंद्र सरकार के अधिकार निहित हैं, राज्य सरकार के पट्टेदार हैं, इस तरह की भूमि पर किसी भी तरह के सतह किराये या भूमि के किराये के भुगतान का प्रश्न ही नहीं उठता। जहां तक सीबीए अधिनियम, 1957 में धारा 18 क का सम्बन्ध है, यह खंड राज्य सरकार द्वारा दिए गए खनन पट्टे के तहत रॉयल्टी के भुगतान की सुविधा देता है। कोयला कम्पनियां राज्य सरकार को समय-समय पर निर्धारित ऐसी रॉयल्टी का भुगतान कर रही है।” उल्लेखनीय है कि जब कोयला खदानों के ऊपर भूमि लगान बकाये के मसले पर ठेंगा दिखाते हुए, टका सा जवाब दे दिया था, तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए गठबंधन सत्तासीन था और झारखण्ड का नेतृत्व श्री हेमंत सोरेन ही कर रहे थे, कांग्रेस और आरजेडी तब भी सरकार में शामिल थे।
इस लिहाज से, इस मामले में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार को झारखण्ड के प्रति ज्यादा उदार और संवेदनशील कहा जा सकता है। दिनांक 30 जुलाई 2020 को झारखण्ड के मुख्यमंत्री के साथ रांची आकर केन्द्रीय कोयला मंत्री ने एक बैठक की थी जिसमे झारखण्ड सरकार को भूमि लागत के भुगतान सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गयी थी। इस बैठक में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलहाल भारत सरकार जनजातीय मामलों के मंत्री का दायित्व संभाल रहे श्री अर्जुन मुंडा भी शामिल थेद्यकेन्द्रीय कोयला मंत्री ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के नकारात्मक रवैये की जगह संवेदनशील और उदार रवैया दिखाया और बैठक में सैद्धांतिक रूप से यह निर्णय लिया गया कि सीबीए अधिनियम के तहत अधिग्रहित सरकारी भूमि का भुगतान कृषि भूमि के वर्तमान सर्किल दर के अनुसार किया जायद्य सीसीएल द्वारा अधिग्रहित भूमि के संयुक्त सत्यापन के बाद राज्य सरकार को मुआवजे का भुगतान किया जायेगाद्य इसके साथ-साथ यह निर्णय भी लिया गया था कि सीसीएल द्वारा अधिग्रहित सरकारी भूमि का ठीक परिमाप निर्धारित करने के लिए राज्य सरकार सीआईएल/सीसीएल के अधिकारियों के साथ एक समिति गठित कर अंतरिम रूप से उसी बैठक के दौरान भारत सरकार के कोयला मंत्रालय द्वारा 250 करोड़ का भुगतान किया भी गया।
श्री पोद्दार ने कहा कि केन्द्रीय कोयला कंपनियों पर बकाये का मामला वाजिब है या नहीं, ये तो जानकार तय करेंगे और उपयुक्त फोरम पर तय होगाद्य पर केन्द्रीय कोयला मंत्री के पत्र से स्पष्ट है कि केंद्र में सत्तासीन रही कांग्रेस या यूपीए की सरकारों ने कभी भी झारखण्ड की मांग को इज्जत नहीं दी और ठेंगा दिखाकर टरका दियाद्य जबकि भाजपा की सरकार ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की दलीलों की आड़ न लेकर झारखण्ड के प्रति भावनात्मक लगाव को प्राथमिकता दी न सिर्फ भुगतान के लिए राजी हुई, बल्कि 250 करोड़ देकर शुरुआत की, इस बात का प्रमाण दिया कि झारखण्ड की मांग के प्रति केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार संवेदनशील रवैया रखती है। इसके बावजूद राज्य सरकार के कांग्रेसी मंत्री आये दिन केंद्र पर उपेक्षा का आरोप लगाते हैं और अपनी अबतक की करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं।
श्री पोद्दार ने कहा कि कष्ट का विषय यह भी है कि केंद्र के इस उदार रवैये और बैठक में कृषि भूमि के वर्तमान सर्किल दर पर भुगतान की सहमति बनने के बाद भी झारखण्ड सरकार अभी भी सीबीए (एएंडडी) अधिनियम, 1957 के तहत अधिग्रहित सरकारी भूमि और साथ ही सरकारी जंगल-झाड़ी भूमि के लिए वाणिज्यिक दर के आधार पर भुगतान जमा करने हेतु राज्य में स्थित सीसीएल और अन्य कोयला कंपनियों को कह रही है।

Social Media Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
%d bloggers like this: