हम बात कर रहे हैं फ़ुटबॉलर नादिर की , एक समय था जब वह फुटबॉल को किक मारता था तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठता था। उसे डिफेंस का मास्टर माना जाता था। मैदान में जोश भरने वाले इस शख्स की पहचान पूरे बिहार में कैप्टन के नाम से थी । उसने कई बार हारी हुई बाजी भी जीती है। पूरी टीम उसे अपना गुरु मानती थी। वह अपने साथी की आंखों में पूरे खेल को पढ़ लेता था। एक बार उसके पांव के नीचे फुटबॉल आई तो वह गोल पर जाकर ही रुकती। बिहार टीम के कप्तान रह चुक हैं नादिर । पर अफसोस सुनहरे अतीत जैसा उनका वर्तमान नहीं है। भरसक प्रयास के बाद भी नौकरी नहीं मिली तो गुजारे के लिए नादिर को जूते की दुकान खोलनी पड़ी। यह खेल और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की तमाम सरकारी नीतियों और नाकामीयो की पोल खोलती है । आज नादिर जैसे कई अन्य खिलाड़ी व अंपायर समय थपेड़ों से हार कर जीवनयापन के लिए कोई जूता तो कोई चाय लिट्टी बेचने को विवश हैं।

बिहार फुटबॉल टीम के कप्तान रहे नादिर ने भी भारत को फीफा तक ले जाने का सपना देखा था। और इसके लिए उसने दिन रात मेहनत भी किया था नातिज़ा बहुत कम समय में ही राज्य के जाने माने खिलाड़ीयों उनका शुमार हो गया। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका भी मिला पर घर की तंगहाली ने उनके पांव बांध दिए। वक्त तेजी से गुजर रहा था लेकिन नादिर की जिंदगी उतनी ही धीमी होती जा रही थी। उम्र बढ़ती गई, सरकार ने साथ नहीं दिया तो कदम मैदान से नौकरी ढूंढने के लिए निकले। राज्य सरकार ने खेल कोटे से नियुक्तियों पर रोक लगा रखी थी। अब कहीं कोई और मौका नहीं था तो अपने बड़े भाई के साथ शहर के दरियापुर में जूते की दुकान खोल ली। इसके बावजूद उनकी फुटबाल के प्रति दीवानगी कम नहीं हुई है। वह आज भी राज मिल्क की ओर से फुटबॉल खेलते है ।

राज्य सरकार ने खेल कोटे से नौकरी देने का प्रावधान किया है
हकीकत: वर्ष 2015 में अलग अलग विभागों में 258 पदों पर खेल कोटे से निकली भर्ती में 1200 खिलाड़ियों ने आवेदन किया। फिर भर्ती ठंडे बस्ते में चली गई। खिलाड़ियों के लगातार विरोध करने पर 2019 में 258 पदों के लिए चयनित सूची जारी की गई।

खिलाड़ी कल्याण कोष में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को सहायता राशि का प्रावधान है।
हकीकत: बाबर, नादिर और विपिन जैसे सैकड़ों खिलाड़ी हैं, जिन्हें आज तक कोई सहायता नहीं दी गई।

खेल दिवस पर राज्य सरकार द्वारा खिलाड़ियों को सम्मानित किए जाने का प्रावधान है।
हकीकत: हर साल यह सम्मान समारोह विवादों के घेरे में रहता है।

कल काअंपायर आज चाय बेचने को मजबू
यतेंद्र कुमार हर रोज की तरह शनिवार की दोपहर भी राजेंद्र नगर में ठेले पर दुकान सजाने की तैयारी कर रहे थे। सरकारी अफसरों की तरफ से मिले तमाम आश्वासनों के बाद भी जब रोजी-रोटी का कोई जुगाड़ नहीं हुआ तो ठेले पर ही चाय और लिट्टी बेचना शुरू कर दिया। यतेंद्र राज्य के जाने-पहचाने स्टेट पैनल के अंपायर हैं। वह बिहार क्रिकेट एसोसिएशन (बीसीए) के टूर्नामेंट में अंपायरिंग करते हैं। इसके अलावा, यतेंद्र बीसीसीआई के टूर्नामेंट में बिहार क्रिकेट टीम के स्थानीय मैनेजर का भी काम देख चुके हैं। उनके पास इतनी सारी उपलब्धियां हैं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद न मिलने के कारण परिवार की खातिर चाय और लिट्टी बेचने को मजबूर हैं।

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