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बरसात हो या गर्मी, हर दिन आठ से दस हजार श्रमिक रोजगार की तलाश में आते हैं राजधानी


रांची:- चाहे बरसात हो या गर्मी अथवा ठंड का मौसम। हर सुबह में आठ से दस हजार श्रमिक रोजगार की तलाश में राजधानी रांची आते हैं। शहर के विभिन्न इलाकों में प्रतिदिन सुबह में करीब आठ से दस हजार श्रमिक की काम की तलाश में पहुंचते हैं, इनमें महिला मजदूर (रेजा) भी शामिल हैं। लोग अपनी इनकी बोली लगाकर अपने घर-मकान-दुकान में काम कराने के लिए ले जाते हैं। जानकारों का मानना है कि इनमें से 20 से 30 फीसदी को प्रतिदिन काम नहीं मिल पाता हैं।
राजधानी रांची के पिस्का मोड़, हरमू बाईपास, हरमू कॉलोनी, हटिया चौक, बिरसा चौक, कोकर, डोरंडा, लालपुर-कोकर समेत अन्य प्रमुख इलाकों में सुबह साढ़े सात-आठ बजे से ही मजदूर बाजार पहुंचने लगते हैं, यहां प्रतिदिन काम की खोज में रांची से 40-50 किमी की दूर से भी लोग पहुंचते हैं, लेकिन कई श्रमिकों को तो किसी-किसी दिन बैरंग वापस लौटना पड़ जाता है और उनके आने-जाने का खर्च भी नहीं निकल पाता हैं। रांची में काम करने के लिए जिले के ही विभिन्न ग्रामीण इलाकों से लोग नहीं पहुंचते है, बल्कि आसपास के जिले खूंटी, रामगढ़, गुमला, लोहरदगा, लातेहार समेत अन्य जिलों से लोग यहां पहुंचते है, वहीं कुछ श्रमिक कम किराये के झोपड़ीनुमा आवास में रहकर अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मजबूर हैं। इंसानों की मंडियों में हर तरह के श्रमिक मिल पाएंगे, चाहे राजमिस्त्री की जरूरत हो या कुली अथवा रेजा की आवश्यकता हो, सभी श्रेणी के श्रमिक प्रतिदिन काम की तलाश में इन मंडियों में पहुंचते हैं। कई मंडियों में वॉल पेटिंग और अन्य कामों में दक्ष श्रमिक भी रोजगार के अभाव में काम की तलाश में यहां पहुंचते हैं।
रांची के हटिया चौक पर काम की तलाश में पहुंचे रामचंद्र मिस्त्री, सालिक विजया और राजकुमारी देवी का कहना है कि प्रतिदिन उन्हें काम भी नहीं मिल पाता है, वहीं महंगाई बढ़ने से परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया हैं। वहीं इन श्रमिकों को उचित मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है, जबकि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के राजमिस्त्री और अन्य श्रमिक संगठित हो कर कम दाम में ही मकान-दुकान बनाने का ठेका ले लेते हैं, जिसके कारण यहां के श्रमिकों को काम मिलने में भी कठिनाई होती है और काम मिल भी जाता है, तो उचित मजदूरी भी नहीं मिल पाती हैं।

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