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मॉल में तब्दील हो रहे आरा के सिनेमा हॉल


आरा:- हाल के दशकों में टीवी चैनलों की धूम, इंटरनेट के प्रसार, मोबाइल और यूट्यूब के चलन और भाग दौड़ की जिंदगी ने सिनेमा हॉल से दर्शकों को दूर करके रख दिया है।
नब्बे और दो हजार के दशक तक सिनेमा हॉल में दर्शकों का जो जलवा था वह दो हजार बीस के दशक आते आते बिल्कुल बिखरने लगा और वैश्वीक महामारी कोरोना से तो सिनेमा हॉल में वीरानगी ही छा गई। भोजपुर जिले के आरा शहर में रूपम सिनेमा, मोतीमहल, मोहन सिनेमा और सपना सिनेमा कभी सीने प्रेमियों और दर्शकों के लिए मनोरंजन का बड़ा केंद्र हुआ करते थे किंतु अब इनमे से कुछ सिनेमा हॉल जमींदोज हो गए तो कुछ जमींदोज होने की राह पर है। आरा के करमन टोला स्थित मोती महल सिनेमा का अपना सुनहरा इतिहास रहा है। रोटी फिल्म के प्रमोशन के लिए सुपरस्टार राजेश खन्ना भी यहां आये थे। आज यह सिनेमा हॉल पूरी तरह बन्द कर दिया गया है। यह सिनेमा हॉल 1975 से ही संचालित हो रहा था। करीब सात साल पहले मोती महल सिनेमा नये ढंग से सुसज्जित किया गया था। यूएफओ सिस्टम, सेटेलाइट, जेबीएल साउंड बॉक्स, महंगी स्क्रीन, लक्जरियस सीटों जैसी आधुनिक सुविधाओं से इस हॉल लैस किया गया था तब आरा नगर के नागरिकों ने परिवार के साथ इस सिनेमा हॉल की ओर दोबारा रूख किया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर ने इस सिनेमा हॉल को भी बन्द होने पर विवश कर दिया। रूपम सिनेमा पहले ही बन्द हो चुका है और अब इस सिनेमा हॉल की जगह मॉल का निर्माण हो चुका है। आरा के जेल रोड स्थित रूपम सिनेमा हॉल के प्रोपराइटर एसपी देशमुख को वर्ष 2006 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से पुरस्कृत होने का गौरव हासिल है। उसी समय आरा के रूपम सिनेमा हॉल की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी। सबसे पुराना सिनेमा हॉल मोहन सिनेमा भी कोरोना की पहली और दूसरी लहर बर्दास्त नही कर पाया और अब यह सिनेमा हॉल भी तोड़ा जा रहा है। अब एकमात्र सिनेमा हॉल सपना सिनेमा ही अस्तित्व में है और कोरोना की मार झेल रहा यह सिनेमा हॉल भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए फिलहाल संघर्ष कर रहा है।जिले के बिहियाँ और पीरो के सिनेमा हॉल पहले ही बन्द हो चुके हैं। दर्शकों की सिनेमा हॉल से बढ़ती दूरी और कोरोना महामारी ने भोजपुर में आरा शहर के सिनेमा हॉल के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिया है।भोजपुर जिला सहित आरा शहर में सिनेमा हॉल कहीं इतिहास न बन जाय, यही चिंता अब जिलेवासियों को सताने लगा है। सिनेमा हॉल का व्यवसाय घाटे का सौदा हो गया है, यही कारण है कि नब्बे के दशक तक सिनेमा हॉल के कारोबार को शानो शौकत मानने वाले व्यवसायी अब सिनेमा हॉल पर बुलडोजर चलवाकर वहां बड़े बड़े शॉपिंग मॉल और होटल खड़े कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि सिनेमा हॉल व्यवसाय को प्रोत्साहित करने के लिए उसे सुविधाओ के साथ साथ अनुदान दे ताकि विकसित हो रहे देश की चकाचौंध,टीवी चैनलों की बाढ़,इंटरनेट और यूट्यूब की रौशनी में सिनेमा हॉल का सुनहरा पर्दा धुंधला न पड़ जाय।

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