अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

रहने को सदा दहर में, आता नहीं कोई तुम जैसे गए, ऐसे भी जाता नहीं कोई

मनातू:- आज कैफ़ी आज़मी साहब की ये पंक्ति याद आ रही है। आज के ही दिन 17 जून 2005, गंगा दशहरा की तिथि की सुबह जब प्राची में भगवान भास्कर की शक्ति का उदय होने वाला था, इस पारलौकिक शक्ति का इहलौकिक अस्त हुआ।
अध्यात्म के फलक पर अप्रतिम प्रकाशपुंज दीदी नीलम आनन्द, भौतिक और पारलौकिक ऊर्जा का विलक्षण समन्वय। प्रेम की आदर्श आधारशिला पर विकसित उनका जीवन, जिनके विचार किसी वाद या सिद्धांत से पृथक एक मार्गदर्शन है जो विराग से भिन्न इस जगत के माध्यम से हमें आत्मज्ञान की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने अपने पति और महेश्वर शिव के अनन्य शिष्य श्री हरीन्द्रानन्द जी के साथ मिलकर शिव गुरु के वास्तविक स्वरूप से जनमानस को परिचय कराते हुए भारतीय अध्यात्म को एक नई दिशा दी। वर्णाश्रम धर्म और भारतीय समाज की रूढ़ियों जिनके कारण हमारा नैतिक पतन हो रहा था, के विरुद्ध भावनात्मक विद्रोह पैदा किया और इस धारणा को सार्थक करने का जीवन पर्यंत प्रयास किया कि “जाति, धर्म, लिंग और संप्रदाय से ऊपर है शिव की शिष्यता।” मानवीय समाज को एकता के धरातल पर लाने की पूरी चेष्टा कीं और उनके इस प्रयास में उन्हें सफलता भी मिली। आज सचमुच उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप शिव शिष्य परिवार जाति, धर्म, लिंग, सम्प्रदाय से ऊपर एक वैश्विक परिवार के रूप में प्रतिष्ठापित है।
वे शिव की महान शिष्या थीं जिसकी परिकल्पना हम जैसे अनुमानव नही कर सकते। आज आप हमारे बीच नही है लेकिन आपकीं स्मृतियां हमारे जीवन पथ को आलोकित करती हैं और करती रहेंगी। आपके शब्द किसी महालय में बजते चांदी के घण्टे की मधुर ध्वनि की भांति सदैव गूंजते रहते हैं “आपका जीवन सुखमय हो, शिवमय हो आप शिव के शिष्य बने रहें” आपकी यह मंगलकामना मानवी सृष्टि को अनन्त काल तक शिव गुरु से जोड़े रखेगी, बांधे रखेगी।
आपके ममत्व की निर्झरणी अबाध्य रूप से बहती रहेगी और मानव जीवन आप्लावित होते रहेगा। आपके प्यार के स्नेहिल छाँव तले हम सभी पुष्पित और पल्लवित होते रहेंगे।

आपके प्रति लेखक श्रद्धांजलि पुष्पार्पित करता। है।

मौआर पंकज जीत

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