November 24, 2020

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कश्मीर में केंद्र की रणनीति की सफलता की देन है ‘गुपकार एलायंस’

नई दिल्ली:- जम्मू कश्मीर में पंचायत चुनावों की घोषणा के बाद से वहां के धुर विरोधी राजनैतिक दलों के ‘गुपकार एलायंस’ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) व केंद्र सरकार के बीच बयानबाजी जोरों पर है। अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद से सूबे की सियासत में अपनी जमीन बचाने के लिए ‘गुपकार एलायंस’ जहां विवादास्पद बयानों के जरिए राज्य की जनता का मन और समर्थन टटोलने में जुटा है। धुर विरोधी दलों के एक मंच पर आने को केंद्र सरकार और भाजपा की रणनीति की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार राकेश शुक्ला ‘गुपकार एलायंस’ के भड़काऊ बयानों पर कहते हैं कि दरअसल ये राजनीतिक जमीन खिसकने के कारण उपजी खिसियाहट की देन है। शुक्ला के अनुसार, यह मायने नहीं रखता कि केंद्र सरकार आक्रामक ढ़ंग से ‘गुपकार एलायंस’ के बयानों पर पलटवार कर रही है, महत्वपूर्ण ये है कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां पैदा हुईं कि जम्मू कश्मीर में तमाम धुर विरोधी राजनैतिक पार्टियों को एक शामियाने के नीचे आना पड़ा।
शुक्ला आगे कहते हैं कि पांच अगस्त 2019 में जब जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 समाप्त हुई। इस अनुच्छेद के समाप्त होने के बाद एक साल से ज्यादा समय बीत गया। इस अवधि में जम्मू कश्मीर में एक भी ऐसी घटना नहीं हुई, जिससे यह जाहिर हो कि वहां अनुच्छेद-370 समाप्त होने के बाद किसी तरह की नकारात्मक प्रतिक्रिया है। उसका कारण यही था कि जो दल गुपकार एलायंस बनाकर राजनैतिक रोटी गर्म करने का काम कर रहे हैं वह सारे लोग नजरबंद कर दिए गए थे। यदि वह सारे लोग तब बाहर होते तो कश्मीर जल रहा होता।
वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि आज गुपकार ग्रुप के सारे सदस्य, चाहे वह पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), नेशनल कांफ्रेंस अथवा किसी अन्य दल के हों, इनके अस्तित्व पर संकट आ खड़ा हुआ है। जम्मू कश्मीर में परिवारवादी राजनीति की बात उठती रही है और कहा जाता रहा है कि कुछ परिवारों के हाथ में ही जम्मू कश्मीर है और वही लोग खेल रहे है। अनुच्छेद-370 समाप्त होने के बाद आज जम्मू कश्मीर की राजनीति उन परिवारों से निकल कर समाज के बीच में उतर आई है, ऐसे में महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला जैसे नेता फिर से जम्मू कश्मीर को उसी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं, जिस रास्ते पर रखकर वह अपनी राजनीतिक स्वार्थ की सिद्धि किया करते थे।

महबूबा कर रही हैं उपद्रवी माहौल पैदा करने का प्रयास

शुक्ला कहते हैं कि महबूबा मुफ्ती की तरफ से फिर से वहां उपद्रवी माहौल पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। इसीलिए उन्होंने दो बातों का समर्थन किया है। एक, तिरंगा नहीं उठाएंगे और दूसरा, बंदूक उठाने वालों का साथ देने की बात कही। इससे साफ है कि उनकी मंशा जम्मू कश्मीर में शांति व्यवस्था कायम करने की नहीं है। वह लोग चाहते हैं कि जम्मू कश्मीर अस्थिरता, भय और भ्रम के माहौल में रहे। ऐसे में उनकी राजनैतिक स्वार्थ की सिद्धि आसानी से होगी।
महबूबा का राजनीतिक दौर समाप्त होने का संकेत
अनुच्छेद-370 की समाप्ति और 14 माह की नजरबंदी से रिहा होने के बाद महबूबा मुफ्ती जब अपने पैतृक गांव बिजबेहड़ा गईं तो हालात बदल से गए थे। वह अपने पिता की कब्र पर हाजिरी देने पहुंचीं तो बमुश्किल 10 लोग उनके साथ थे। वहां तकरीबन पौन घंटे का समय बिताने के बाद महबूबा पुश्तैनी घर न जाकर सीधे श्रीनगर लौट गईं। जबकि उनके पिती मुफ्ती मोहम्मद सईद जब भी जाते थे तो लोग उनसे मिलने के लिए कतारें लगाते, किंतु महबूबा के जाने पर ऐसा कुछ न हुआ। राकेश शुक्ला इसे महबूबा मुफ्ती की राजनीति समाप्त होने का संकेत बताते हैं। इसका कारण गिनाते हुए वह कहते हैं कि आंकड़ा उठाकर देखिए तो आप पाएंगे कि केंद्र सरकार की जितनी कल्याणकारी योजनाएं जम्मू कश्मीर में चल रही हैं, उनका सीधा लाभ जनता को मिल रहा है। चाहे वह प्रधानमंत्री योजना, जनधन योजना, उज्जवला योजना हो। केंद्रीय योजनाओं का लाभ जब वहां आम जनता को सीधे मिलेगा तो निश्चित तौर पर जनता यह जान जाएगी कि अभी तक उसे पीछे रखकर सिर्फ राजनीति की जा रही थी, उसकी बजाय केंद्र की भाजपा नेतृत्व की सरकार कहीं न कहीं जनहितकारी कदम उठाती है और जनता की सुविधाओं का ध्यान रखती है।
शुक्ला कहते हैं कि इसीलिए बिजबेहड़ा में वहां के लोगों ने महबूबा मुफ्ती को एक तरह से यह संकेत दे दिया कि उनका राजनैतिक दौर समाप्त हो गया है। इस बात का एहसास केवल महबूबा को ही नहीं, फारूक अब्दुल्ला को भी हो गया है कि उनकी राजनीतिक जमीन अब खिसक गई है। इसी कारण, दोनों एक मंच पर आ गए हैं। धुर विरोधियों का एक मंच पर आना बताता है कि केंद्र सरकार और भाजपा की जो रणनीति है वह फलीभूत हो रही है। उनका कहना है कि गुपकार एलायंस इसीलिए भड़काऊ बयान देकर 22 नवम्बर से शुरू होकर 29 दिसम्बर तक चलने वाले पंचायत चुनावों में अपने लिए खोई हुई सियासी जमीन को उर्वर बनााने का प्रयास कर रहा है।

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