November 24, 2020

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बन तो गए बिहार के CM नीतीश कुमार, लेकिन करना पड़ेगा इन 5 चुनौतियां का सामना

नई दिल्ली:- बिहार विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बहुमत मिलने के बाद सभी की निगाहें अगली सरकार के गठन पर टिक गई हैं।नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के सीएम बनने के लिए तैयार हैं। अब आगे कोई बड़ा राजनीतिक उठापटक नहीं हुआ तो दिवाली के तुरंत बाद राज्य के सीएम के रूप में 7वीं बार शपथ लेंगे। लेकिन इस बार हालात भी अलग होंगे और चुनौतियां भी। इसके साथ ही न सिर्फ एक सीएम के रूप में बल्कि जेडीयू सुप्रीमो के रूप में उनके लिए नई चुनौती शुरू होगी। इस बार उन्हें अपने सियासी जीवन का सबसे कठिन चुनाव जीतने के बाद भी कोई हनीमून पीरियड नहीं मिलेगा। पढ़िए, नीतीश के सामने खड़ी पांच चुनौतियां, जो आने वाली हैं….

सरकार पर पहले की तरह नियंत्रण रख सकेंगे

नीतीश कुमार सातवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे। नीतीश सबसे पहले साल 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे नीतीश कुमार पूरी मजबूती और बिना हस्तक्षेप के काम करने वाले सीएम माने जाते रहे हैं। आलोचक उनकी शैली को बिना किसी से विचार किए फैसला लेने वाले सीएम रहने का भी आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस बार उनके सामने ऐसी खुली आजादी कतई नहीं होगी। सरकार के अंदर उनकी हिस्सेदारी भी कम होगी।
कैबिनेट में बीजेपी के अधिक मंत्री होंगे। इसके अलावा जीतन मांझी और मुकेश सहनी की पार्टी को भी एक-एक पद मिल सकता है। इस तरह फिर से सीएम बनने वाले नीतीश कुमार काे अपने नियंत्रण में रखकर शासन करने की चुनौती रहेगी। याद रखें कि 2015 में जब आरजेडी अधिक सीट लेकर सरकार में हिस्सेदार हुई तो कुछ महीने बाद ही कई मसलों पर वे असहज हो गये थे।

मजबूत विपक्ष का सामना

नीतीश कुमार ने पहली बार साल 2000 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि बहुमत के लिए जरूरी विधायकों का समर्थन नहीं मिलने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद साल 2005 में एनडीए को पूर्ण बहुमत मिलने पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार पहली बार मजबूत विपक्ष का भी सामना करेंगे। 2005 में पहली बार वह पूर्णकालिक सीएम बने थे तब से लालू प्रसाद यादव का लगातार पतन होता गया। 2009 आते-आते पूरा विपक्ष और कमजोर हो गया। लेकिन इस बार विपक्ष के कम से कम 115 विधायक रहेंगे। न सिर्फ संख्या बल बल्कि तेजस्वी यादव ने खुद को लालू के साये से निकालकर एक मजबूत नेता के रूप में लाए हैं। हाल के सालों में बिहार में कभी मजबूत विपक्ष का नेता नहीं देखा था। जाहिर है विपक्ष नीतीश कुमार को असहज करने की हर कोशिश करेगा। इससे वह किस तरह सामना करेंगे,इसके लिए चुनौती अभी से शुरू होगी।

पार्टी के लिए उत्तराधिकारी की तलाश

नीतीश कुमार ने पूर्णिया में एक चुनावी रैली में कहा था, “आज चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन है, परसों चुनाव है और ये मेरा आखिरी चुनाव है, अंत भला तो सब भला…5 नवंबर को जब उन्होंने मंच से ये बात कही तो कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें अब अपना राजनीतिक अंत दिखने लगा है। 69 साल के नीतीश कुमार पर उस सवाल को लेकर अब आगे आने वाले दिनों में लगातार सवाल पूछे जाएंगे। इसका मुख्य कारण है कि डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद भी अब तक पार्टी के अंदर नंबर दो या अगली पीढ़ी के नेता को तय नहीं कर सके। अब जबकि वह खुद और उनकी पार्टी जीतने के बावजूद ढलान पर दिख रही है,वहां उत्तराधिकारी या नंबर दो की स्थिति साफ करनी होगी। यह अभी उतना आसान नहीं होगा। लेकिन इसके किए बिना पार्टी के लिए और मुश्किल खड़ी हो सकती है।

सुशासन की छवि को वापस पाना

भले नीतीश कुमार जीतने में सफल हुए हो लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि जमीन पर नीतीश सरकार के लिए बहुत नाराजगी थी। एंटी इनकंबेंसी का सामना कर रहे थे। लोगों का सीधा आरोप था कि पिछले कुछ सालों में नीतीश कुमार कमजोर सीएम हो गये हैं। अब नयी पारी शुरू करने के बाद नीतीश के पास बहुत वक्त नहीं होगा इस धारणा को बदलने के लिए। अगर यह गुस्सा कम नहीं हुआ तो जीतने के बावजूद नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

शराबबंदी पर लेना होगा फैसला

नीतीश कुमार ने 2015 में शराबबंदी का फैसला लिया था। तब इसे खासकर राज्य की महिलाओं ने खूब सराहा। शुरुआती दिनों में इसे प्रभावी तरीके से लागू कर दिया गया। लेकिन आज की तारीख में यह फैसला राज्य के गले की फांस बन गई है। एक तरफ खुलेआम अवैध तरीके से शराब मिलने का आरोप लग रहा है तो दूसरी ओर आर्थिक रूप से इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। अभी राज्य गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इस मसले पर नीतीश को तत्काल कुछ स्पष्ट फैसला लेना पड़ सकता है।

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