December 6, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

मध्याह्न के मार्तण्ड : हरीन्द्रानन्द

जन्मदिन विशेष 31अक्टूबर 2020

राँची:- वेदना में एक शक्ति है,जो दृष्टि देती है।जो यातना में है वह द्रष्टा हो सकता है।
जब वेदना मन की होती है,यातना अध्यात्मिक संकुचन की होती है तभी मानव मन समस्त संकीर्णताओं को विदीर्ण करता है।सहस्त्र वर्षों से सुषुप्त आध्यत्मिक तमस को मध्याह्न के मार्तण्ड श्री हरीन्द्रानन्द जी ने विदीर्ण किया।महागुरु महादेव के अनन्य शिष्य हैं,आप।वर्तमान परिवेश में समष्टि और व्यष्टि के पतनोन्मुख आचरण को संयमित और संतुलित रखने के निमित्त आध्यात्मिक आदर्श की प्रतिष्ठा आवश्यक हो गई है थी।
कुरुक्षेत्र के रण में जब अर्जुन विषाद के गहन अंधकार में डूब जाता है।किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।अपने समस्त आग्रह का परित्याग कर देता है,तब उसके अंतर से वह सुप्त चेतना स्यात जागृत हो जाती है और बांह पकड़ कर गहन तिमीर से बाहर ले आती है।वह जन्म जन्मांतर का बाल सखा कृष्ण रूप धर प्रस्फुटित हो जाता और गीता के छंदों का अवतरण होता है।वेद व्यास की कृति महाभारत की महत उपलब्धि है कि वो विषम परिस्थिति में ईश्वर और मनुष्य का साक्षात्कार कराते है।
जमुई के एक तांत्रिक से उलझने के पश्चात एक बालमन का उद्वेग अनायास चल पड़ता है।चलता है उस अज्ञात की ओर और चलते जाता है।बस चलते जाता है।एक वेदना है, एक यातना है,काल की समाज की,अनुभूतियों और परिस्थतियों की। बिहार सरकार के पदाधिकारी पिता की लंबी सेवा के स्थान्तरण के साथ-साथ वह भी चलता है। लगभग सभी श्मशानों में घूमता-भटकता रहता है।कोई ठौर नहीं मन मे एक जिज्ञासा है, एक चाहत है,एक हठ है।उस महाभाव की अनुभूति की,उस परम तत्व के ज्ञान की अनुभूति की।कथा लम्बी है।सार संक्षेप है कि अब चलते चलते जीवन आरा पहुँचता है।हाँ, वही आरा जहां पतितपावनी गंगा के छाड़न के तीर पर गांगी श्मशान है।हताश निराश मन विषाद के गहन अंधकार में डूब जाता है।उस विस्तीर्ण, अत्यंत निस्तब्ध अंधेरी रात की शून्यता के मध्य अकस्मात बोध की लहरें उठने लगीं।मानो वह जीवन और परिस्थितियों की यातना से उद्द्बुद्ध होकर ऊंची यथार्थता के लोक में पहुंच गया,अंतर के विषाद ने आत्मदीप्त चेतना का प्रस्फुटन किया।शिवत्व जाग उठा और उस शिवज्ञान के आलोक में वह अनुभूत करता है”गुरु अगर परब्रह्म है तो स्वयं परब्रह्म गुरु क्यों नहीं”? सत्य एक रहस्य है जिसका दर्शन सबको नहीं होता।व्यक्ति विशेष ही विशिष्ट क्षणों में सत्य को देख सकता है। सत्य अंतर्दृष्टि से प्राप्त एक आकस्मिक घटना है जो ज्ञान से अधिक अनुभूति है।
यहीं से शुरू हुई एक यात्रा जिसे स्थान, काल और परिस्थतियाँ म्लान नहीं कर सकीं।अपनी आध्यात्मिक यात्रा में प्राप्त अनुभूतियों के आधार पर हरीन्द्रानन्द जी ने तीन सूत्रों का प्रतिपादन किया।जिसका अवलंबन प्राप्त कर आज मानव जाति अपने लौकिक और पारलौकिक मनोरथ को पूर्ण कर रही है।शिव शिष्यता का यह रसायन सैकड़ों लोगों को उनके रोग,शोक,भय से मुक्त करता हुआ जीवन क्षितिज पर फैल रहा है।यह जीवन के पटल पर समानता का मंत्र लेकर उद्द्भूत हुआ।
इस विधा ने सम्पूर्ण मानव सृष्टि के फ़लक़ पर शिवज्ञान बिखेरने की आकांक्षा से संजात हो वर्णाश्रम धर्म और भारतीय समाज की रूढ़ियों जिनके कारण हमारा नैतिक पतन हो रहा था,के विरुद्ध भावनात्मक जागृति पैदा की।
आध्यात्मिक जागरण का यह संदेश कि”शिव मेरे गुरु हैं,आपके भी हो सकते हैं”।वसुंधरा के जिस कोने में पहुंचा वहाँ दबी हुई मानवता ने दिल खोलकर स्वागत किया……..

लेखक : मौआर पंकज जीत सिंह

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