November 26, 2020

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 : अलौली में जलेगा या अपना घर जलाएगा ‘चिराग’!

खगड़िया:- केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके पैतृक क्षेत्र अलौली विधानसभा क्षेत्र में यह बड़ा सवाल बन गया है कि 2010 के विधानसभा चुनाव तक पासवान परिवार का एकछत्र गढ़ रहा अलौली इस चुनाव में पासवान परिवार के चिराग से रोशन हो पाता है या जदयू की लौ बुझाने के चक्कर में लोजपा अपना राजनीतिक घर खुद जला लेता है। यह तो चुनाव बाद ही पता चलेगा लेकिन इस सीट के लिये सभी दलों में पूरी ताकत झोंक दी है। अलौली में स्व. रामविलास पासवान ने 1969 के चुनाव में मामूली अंतर से कांग्रेस के कद्दावर दलित नेता मिश्री सदा को हराकर एक नई इबारत लिख दी थी और 1977,1985,1990,1995,2000 तथा 2005 के दोनों चुनाव में रामविलास पासवान के छोटे भाई और वर्तमान में हाजीपुर से सांसद पशुपति कुमार पारस ने जीत का परचम लहराया था लेकिन 2010 के चुनाव से ही परिदृश्य पुरी तरह बदल गया। 2010 में जदयू के उम्मीदवार रामचन्द्र सदा ने उन्हें भारी अंतर से शिकस्त दी थी। वही रामचन्द्र सदा इस बार पासवान बंधुओं के ध्वजवाहक बनकर लोजपा के टिकट पर पासवान बंधुओं की राजनीतिक विरासत को बचाने का जतन कर रहे हैं। जबकि राजद ने 2015 के अपने विजेता खिलाड़ी चंदन कुमार का टिकट काटकर अपने पुराने उम्मीदवार रामवृक्ष सदा को मैदान में उतारा है। इस बार के विधानसभा चुनाव में अलौली (अ.जा.) विधानसभा क्षेत्र के 252686 मतदाता चुनाव में भाग ले रहे 14 प्रत्याशियों के किस्मत का फैसला करेंगे। देश की राजनीति में अहम मुकाम हासिल करने वाले अलौली के लाल रामविलास पासवान के आकस्मिक निधन के तुरंत बाद हो रहे इस विधानसभा चुनाव में यह आश्चर्यजनक है कि पासवान परिवार का कोई उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं है। 2015 के चुनाव में पशुपति कुमार पारस राजद उम्मीदवार चंदन कुमार से लगभग 24 हजार मतों से परास्त हो गये थे और ठीक उसी तरह संसदीय राजनीति का रुख कर लिया जैसा कि रामविलास पासवान ने 1972 के चुनाव में मिश्री सदा से शिकस्त खाने के बाद किया था। रामविलास पासवान के निधन के बाद अलौली विधानसभा क्षेत्र के उनके प्रशंसक चाहते थे कि स्व. पासवान की पहली पत्नी अथवा उनकी पुत्री को अलौली की विरासत दी जाये। यदि ऐसा होता तो इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम होते लेकिन पासवान परिवार की महिलाओं को घर की देहरी लांघ कर राजनीति में आने की इजाजत कभी नहीं मिली। हालांकि यह दिलचस्प तथ्य है कि अलौली की कई बेटियां राजनीति में सफलता के झंडे गाड़ चुकी हैं जिसमें खगड़िया की पूर्व सांसद और बिहार सरकार में मंत्री पद संभाल चुकी रेणु कुमारी, समाज कल्याण मंत्री रही मंजू वर्मा तथा खगड़िया विधानसभा क्षेत्र का लगातार प्रतिनिधित्व करती चली आ रहीं पूनम यादव के नाम शामिल हैं। नीतिश कुमार ने जदयू का टिकट पार्टी की पूर्व जिलाध्यक्ष साधना देवी को दिया है। उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में एक चुनाव लड़ने का अनुभव है। जनअधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के टिकट पर पूर्व नक्सली कमांडर बोढ़न सदा न केवल अपनी किस्मत आजमा रहे हैं बल्कि सभी उम्मीदवारों को जीत के प्रति सशंकित बनाये हुये हैं। यह भी गौर करने बात है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों जदयू, राजद, लोजपा और जाप ने महादलित मुसहर समुदाय से अपना प्रत्याशी मैदान में उतारा है।

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