December 4, 2020

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काकोरी के शिवरी गांव की मूर्तियां चीन को देंगी मात

लखनऊ:- क्रान्तिकारियों की धरती काकोरी अब चीन को मात देने के लिए तैयार हैं। जहां दीपावली में चीन निर्मित लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों से बाजार पटा रहता था, अब काकोरी के एक गांव की महिलाओं ने चीनी बाजार को खत्म करने के लिये ठान लिया है। महिलाओं का जज्बा इस कदर हावी है कि यूपी में लक्ष्मी-गणेश की डिमांड को पूरा करने के लिए दिन-रात मूर्तियों के निर्माण में जुटी हुई हैं। यह गांव शिवरी उत्तरप्रदेश की राजधानी से महज 25 किलोमीटर दूर काकोरी ब्लाक में पड़ता है, जहां पर दुर्गा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा लक्ष्मी-गणेश, शंकर, सरस्वती, कुबेर की मूर्ति तैयार की जा रही हैं। इन मूर्तियों को समूह द्वारा तैयार किया जा रहा है उनकी मांग लखनऊ,आगरा, मथुरा, रायबरेली, सीतापुर के साथ ही कोलकाता, राजस्थान जैसे अन्य प्रदेशों से भी की जा रही है।
गांव की छह महिलाओं ने शुरू किया है समूह
शिवरी गांव की छह महिलाओं ने मिलकर इस समूह को शुरू किया है। समूह की महिलाओं ने इस कार्य को अभी पिछले वर्ष ही शुरू किया है। समूह की महिलाओं ने बताया कि कार्य शुरू करने में आर्थिक रूप से दिक्कत हो रही थी लेकिन उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन का साथ मिलने पर आर्थिक समस्या दूर हो गई और कार्य को गति भी मिल रही है। समूह की सखी डाली ने बताया कि हम सभी सखियों का परिवार किसी तरह से चल रहा था। इसी बीच कोरोना की दस्तक हुई और सब कुछ ठप्प हो गया। पूरा परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। डाली ने बताया कि गांव में मूर्ति बनाने का कार्य पुश्तैनी है लेकिन रुपयों के कारण यह कार्य भी दम तोड़ रहा था। इसी बीच आजीविका मिशन ने हम सभी को समूह बनाकर जोड़ दिया तथा अनुदान भी दिए। समूह के सभी सदस्य प्रशिक्षण लिए और अपना कारोबार शुरू कर दिये। डाली ने बताया कि हम सभी ने नवरात्र, दशहरा, दीपावली के लिए मूर्ति बनाने का कार्य शुरू कर दिया है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर साँचा, रंग और मिट्टी का इंतजाम कर काम शुरू कर दिया गया है।
गांव के तालाब या बाहर से मंगायी जाती है मिट्‌टी
समूह की अध्यक्ष राम जानकी ने बताया कि मिट्टी गांव के तालाब से या बाहर से मंगाया जाता है। इसके बाद इसे गीलाकर नरम किया जाता है फिर सांचे के माध्यम से मूर्ति को आकार दिया जाता है। मूर्ति को सांचे में ढालने के उपरांत उसको भिन्न औजारों से तराश कर निखारा जाता है। फिर उसे सुखाकर भिन्न रंगों से सजाया जाता है। समूह से जुड़ी हर सदस्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। सभी अलग-अलग क्षेत्र में पारंगत हैं। कोई तराशता है तो कोई मूर्ति को रंगता है तो कोई सजाता है। इसमें पैकिंग का कार्य भी बहुत महत्वपूर्ण होता है जिसे हम सभी मिलकर करते हैं। उन्होंने बताया कि अभी तो यह कार्य छोटे स्तर पर है लेकिन इसे हम सब मिलकर वृहद स्तर पर ले जाएंगे।
समूह सदस्य संतोषी और गीता बताती हैं कि इस कार्य को घर के कार्यों के साथ ही सम्पन्न कर लेते हैं। इसमें परिवार का भी सहयोग मिल जाता है। मूर्ति को रंगने के लिए कानपुर से रंग लाया जाता है और साँचा लखनऊ में तैयार होता है। मूर्ति बनने के पूर्व ही व्यापारी अपना आर्डर दे दिए हैं।

स्थानीय स्तर पर की जाएगी मूर्तियों की बिक्री

समूह सखी ने बताया कि स्थानीय स्तर पर मूर्तियों की बिक्री की जाएगी। इसके साथ ही साप्ताहिक बाजारों में भी मूर्तियों की बिक्री की जाएगी। उन्होंने बताया कि घर-घर जाकर मूर्तियों की बिक्री की जाएगी। साइज के हिसाब से मूर्तियां बिकती हैं। 25 से लेकर 500 रुपये तक मूर्तियां हैं। डाली ने बताया कि हम मूर्तियां अपने अपने मायके में भी स्टाल के माध्यम से बेचेंगे तथा अपने रिश्तेदारों से भी इसकी बिक्री करेंगे।

मूर्तियों के साथ खिलौनें भी बनाए जाते हैं

महिलाओं द्वारा मूर्तियों के साथ ही खिलौनें भी बनाये जाते हैं। समूह मिट्टी का तोता, कबूतर, गौरैया, उल्लू इत्यादि खिलौनों को बनाता है। उन्होंने कहा कि मिट्टी के खिलौनों को स्थानीय मेलों में बेचा जाएगा। इसके लिए अभी से तैयारी शुरू है। उन्होंने बताया कि कार्तिक मेले में भी उनके द्वारा बिक्री की जाएगी। मिट्टी के खिलौनों से पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।
सीतापुर से आये व्यापारी ओम प्रकाश बताते हैं कि पिछले दो वर्ष से मूर्ति ले जा रहे हैं। इस बार यहां की मूर्तियों की जनपद में ज्यादा मांग है। रायबरेली से आये व्यापारी मो. अल्फेज ने बताया कि हमने 15-16 कार्टून मूर्तियों को एडवांस में ही बुक कर दिया है। यहाँ की मूर्ति काफी टिकाऊ और किफायती होती है। स्थानीय होने के कारण इनकी मांग ज्यादा है।
मूर्ति निर्माण में जुटे आलोक कुमार ने कहा कि योगी सरकार से एक ही अपेक्षा है कि मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करायें। मूर्ति निर्माण के लिए काली मिट्टी की जरूरत होती है। ऐसे मिट्टी वाले तालाबों पर दबंगों का कब्जा या पट्टा है जिसके कारण मिट्टी नहीं मिलती है। इतना ही नहीं दंबगों की गाली-गलौज के साथ ही उन्हें पुलिस की धन उगाही से भी जूझना पड़ता है। वर्तमान में एक ट्राली की कीमत 02 से 03 हजार रुपये चुकानी पड़ती है।

समूहों को मजबूत करने के लिए दिया जा रहा है प्रशिक्षण

उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के निदेशक सुजीत कुमार ने बताया कि समूहों को मजबूत करने के लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य है कि गरीब ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाया जाए। इसी उद्देश्य से मिशन ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को हुनरमंद बनाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर रहा है। उन्होंने बताया कि इस पेशे से जुड़े लोगों की जो भी समस्याएं हैं, उसका समाधान किया जायेगा। जहां तक मिट्टी की समस्या है, उसका शीघ्र ही समाधान भी होगा।

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