November 25, 2020

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आदिवासी भाषा की औपचारिक शिक्षा देने के लिए नोआमुंडी में 27 केंद्र स्थापित

चाईबासा:- नोआमुंडी की जनजातीय (आदिवासी) धरती पर देसी भाषाओं और लिपियों, जैसे- हो, संथाली और मुंडारी आदि की समृद्ध विरासत है। आमतौर पर बोली जाने वाली भाषाओं के रूप में हिंदी और अंग्रेजी की बढ़ती पैठ के कारण आदिवासी समुदाय आशंकित हो गए हैं कि उनकी भाषाओं के विलुप्त होने से उनकी विशिष्ट जातीय पहचान खतरे में पड़ जाएगी। भावी पीढ़ियों के लिए आदिवासी भाषाओं को संरक्षित करने के प्रयास में, टाटा स्टील फाउंडेशन ने आदिवासी हो समाज महासभा और नोआमुंडी आदिवासी एसोसिएशन के साथ मिल कर नोआमुंडी और इसके आसपास 27 प्रशिक्षण केंद्र चला रहे हैं। 2015 से लेकर अब तक इन केंद्रों से 1000 से अधिक विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत के बाद, इस क्षेत्र में देसी भाषाओं का अध्ययन करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ज्ञान को आगे बढ़ाने की रुचि उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। पंडित रघुनाथ मुर्मू अकादमी के भाषा विशेषज्ञों ने कई शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के साथ आसान समझ के लिए अनुकूलित शिक्षण मॉड्यूल विकसित किए हैं।
इस पहल ने जनजातीय बोलियों के संरक्षण की दिशा में काम करने के अलावा, शिक्षकों के लिए आजीविका के अवसर पैदा करने में भी मदद की है। इस परियोजना ने अब तक समुदाय के भीतर से 31 से अधिक शिक्षकों को तैयार किया है। पिछले पांच वर्षों से भाषा शिक्षक के रूप में कार्य कर रही सुनीता बिरूली कहती हैं, “अधिक व्यापक रूप से बोली जाने वाली प्रतिस्पर्धियों, जैसे कि हिंदी और अंग्रेजी को अपनाने से दुर्लभ बोलियों के लुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। इसके संरक्षण की दिशा में कदम उठाने का यह सबसे सही समय है।”
गौरतलब है कि सुश्री सुनीता एक स्वर्ण पदक विजेता हैं, जो अब कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा विभाग में एक सहायक व्याख्याता हैं।
इस परियोजना ने आदिवासी समुदायों के स्थानीय लोगों के बीच गर्व की भावना का संचार किया है। आदिवासी भाषाओं पर ध्यान केंद्रित करने के अलावा, यह कार्यक्रम आदिवासी विरासत के अन्य पहलुओं को संरक्षित करने के लिए भी एक उत्प्रेरक साबित हुआ है, जिसमें उनकी जीवन शैली, पहनावा, संगीत, खेल और प्रदर्शन-कला आदि शामिल हैं। इस परियोजना का चरम उद्देश्य आदिवासी पहचान के एक सकारात्मक और रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के साधन के रूप में जनजातीय भाषाओं के ज्ञान का अधितम लाभ उठाने का है।
श्री जिरेन, हेड (ट्राइबल कल्चर), टाटा स्टील ने बताया, “वर्तमान महत्वाकांक्षा, समुदायों की ओर से एक मांग पैदा कर स्थानीय पब्लिक स्कूलों के पाठ्यक्रम और शिक्षाशास्त्र में जनजातीय भाषाओं को शामिल कराने के साथ-साथ शिक्षकों का एक इकोसिस्टम और इस उद्देश्य के लिए शिक्षण सामग्री तैयार करने की है।

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