November 29, 2020

अनावरण न्यूज़

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महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को जनता से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम बनाया

रांची:- पत्र सूचना कार्यालय व रीजनल आउटरीच ब्यूरो, रांची तथा फील्ड आउटरीच ब्यूरो, गुमला के संयुक्त तत्वावधान में ’महात्मा गांधी और पत्रकारिता’ विषय पर आज वेबिनार परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में शिक्षा एवं जनसंचार क्षेत्र से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञों ने भाग लिया। विशेषज्ञों का कहना था कि महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को जनता से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम बना इसे जन जागरण का हथियार बनाया और अंग्रेजी शासन द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ अपनी बात रखी।
वेबिनार परिचर्चा की शुरुआत करते हुए अपर महानिदेशक पीआईबी- आरओबी, रांची श्री अरिमर्दन सिंह ने कहा कि समाचार पत्र जनता और समाज के बीच में एक कड़ी का काम करता है। गांधी जी ने आम जनों पर हो रहे अत्याचारों की आवाज सरकार यानी अंग्रेजों तक पहुंचाने के लिए पत्रकारिता का माध्यम चुना। आज हमारे पास अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए कई माध्यम जैसे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया तथा सोशल मीडिया हैं। लेकिन आजादी की लड़ाई के समय समाचार पत्र अपनी बात सरकार और लोगों तक पहुंचाने का अकेला साधन था। महात्मा गांधी ने इस साधन का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया। हालात को देखते हुए गांधीजी शालीन तरीके से अपनी बात और अपना विरोध समाचार पत्र के माध्यम से दर्ज कराते रहे। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने जिन मुद्दों को उठाया वह उस समय भी प्रासांगिक थे और आज भी प्रासांगिक हैं।
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के सेंटर फार कल्चर, मीडिया गवर्नेंस के संस्थापक, निदेशक व प्रोफेसर डॉ बिस्वजीत दास ने बताया कि महात्मा गांधी के द्वारा लिखी गई पुस्तकों और निकाले गए समाचार पत्रों और उन समाचार पत्रों में महात्मा गांधी के द्वारा लिखे गए लेखों की संख्या बहुत अधिक है। इससे यह प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी साउथ अफ्रीका से लेकर हिंदुस्तान तक अगर सामाजिक आंदोलनों और आजादी की लड़ाई में व्यस्त नजर आते हैं तो दूसरी ओर महात्मा लगातार अपने लेखन द्वारा लोगों से संपर्क बनाते और लोगों को उत्साह दिलाते दिखते हैं। गांधी जी के लेखन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे साधारण शब्दों और छोटे वाक्यों में बात करते थे। पत्रकारिता को उन्होंने हमेशा एक मिशन के रूप में लिया और इस मिशन को सफल बनाने में लगे रहे।
जब दादा अब्दुल्लाह, महात्मा गांधी को वकालत के लिए दक्षिण अफ्रीका ले गए तो वहां उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से नस्लभेद और भारत से आए बंधुआ मजदूरों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ लोगों को जागृत तथा एकजुट किया। दक्षिण अफ्रीका में उस समय घटित घटनाओं ने महात्मा को बहुत दुखी किया और उन्होंने लियो टॉलस्टॉय को एक पत्र लिखा जिसके जवाब में टॉलस्टॉय ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों और वहां के स्थानीय लोगों पर जिस तरह का अत्याचार हो रहा है वह मानव सभ्यता को कलंकित करता है।
भारतीय जनसंचार संस्थान, ढेंकनाल, ओडिशा के प्रोफेसर तथा रीजनल डायरेक्टर डॉ मृणाल चटर्जी ने कहा कि गांधी जी महात्मा बनने से तीन दशक पहले पत्रकार बन चुके थे। महात्मा गांधी अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान वेजिटेरियन सोसाइटी से जुड़कर वहां से प्रकाशित होने वाले वेजिटेरियन पत्रिका में तरह-तरह के व्यंजनों के बारे में लिखते थे। इस प्रकार अगर देखा जाए तो महात्मा गांधी की पत्रकारिता व्यंजनों पर लिखने वाले एक पत्रकार के रूप में आरंभ होती है। नवजीवन, यंग इंडिया और गांधी जी द्वारा निकाले गए दूसरे जर्नल, समाचार पत्रों में गांधी जी के लेखों से यह साफ झलकता है कि वो पत्रकारिता समाज में फैली बुराइयों को दूर करने, आजादी के आंदोलन को बल देने के साथ-साथ लोगों को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए उत्साहित करती है। गांधीजी की पत्रकारिता ने लोगों के अंदर नई चेतना और ज्योति जगाने का काम किया।
1933 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए हरिजन समाचार पत्र ने जहां लोगों को सामाजिक सुधार और आजादी के आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, वहीं दूसरी ओर हरिजन समाचार पत्र लोगों को सही दिशा में अपनी उर्जा को लगाने के लिए प्रेरित करता था। हरिजन के प्रकाशन को अंग्रेजों द्वारा कई बार निलंबित किया गया लेकिन महात्मा गांधी के उत्साह में कोई कमी नहीं आई और निरंतर वह अपने मिशन में लगे रहे।

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