October 25, 2020

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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों पर टिका है ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स का भविष्य

नई दिल्ली:- साल 2020 में अब तक कई अप्रत्याशित घटनाएं देखने की मिली हैं। लेकिन साल अभी पूरा नहीं हुआ है। अभी अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव बाकी है। अगर किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में स्पष्ट जनादेश नहीं मिलता है तो देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। आशंका जताई जा रही है कि अगर डॉनल्ड ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं तो देश में भयानक दंगे भड़क सकते हैं।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य वी अनंत नागेश्वरन ने एक लेख में कहा कि अगर 3 नवंबर को होने वाले चुनावों के बाद किसी एक उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो देश में अनिश्चितता और भ्रम की स्थिति पैदा होगी। इसके दुनिया के फाइनेंशियल मार्केट्स में कई तरह के जोखिम पैदा हो सकते हैं। अगर अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के स्पष्ट नतीजे नहीं आते हैं तो यह चीन के लिए तीसरा संकेत होगा कि उसका समय आ चुका है। वित्तीय संकट और कोविड-19 महामारी ने अमेरिका को काफी नुकसान पहुंचाया है। इससे चीन की हिम्मत बढ़ सकती है और वह सैन्य तथा दूसरे मोर्चों पर ज्यादा आक्रामक हो सकता है। इससे खासकर भारत और ताइवान को ज्यादा खतरा है।

डॉलर पर असर

अगर अमेरिका में अनिश्चितता और अराजकता की स्थिति पैदा होती है तो इसका असर सीधे-सीधे डॉलर पर पड़ेगा। कोविड-19 महामारी के पैर पसारने के बाद मार्च में डॉलर मजबूत हुआ क्योंकि वैश्विक वित्तीय बाजारों ने जोखिम लेने के बजाय इससे बचने का रास्ता अपनाया। लेकिन इसके बाद अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने मंदी और बढ़ती बेरोजगारी से निपटने के लिए आक्रामक रुख अपनाया और ब्याज दरों को जीरो कर दिया। साथ ही उसने फाइनेंशियल एसेट्स को खरीदने की प्रतिबद्धता भी जताई। इससे डॉलर कमजोर पड़ने लगा।
इसके बाद के महीनों में जोखिम की भूख बढ़ी लेकिन डॉलर कमजोर बना रहा। अगस्त में फेडलर रिजर्व के चेयरपर्सन जेरोम पॉवेल ने नई मॉनिटरी पॉलिसी फ्रेमवर्क की घोषणा की। अमेरिका महंगाई को 2 फीसदी तक जाने की अनुमति देगा। हालांकि अमेरिका में हाल तक महंगाई को लेकर कोई लक्ष्य नहीं रहा है।

भारत के लिए मायने

अगर अमेरिका राजनीतिक अफरातफरी से डॉलर कमजोर होता है तो यह अच्छी खबर नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि अभी दुनिया में कोई भी अमेरिका की जगह लेने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में ग्लोबल इकनॉमिक रिकवरी की संभावनाएं क्षीण होंगी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। स्थानीय मुद्रा के मजूबत बने रहने के बावजूद स्टॉक मार्केट में गिरावट आएगी।

डॉलर की कमजोरी भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अभिशाप बनेगी या वरदान, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इस कमजोरी का कारण क्या है। इसलिए अमेरिकी चुनावों में बहुत कुछ दाव पर लगा है। अगर सबकुछ ठीकठाक रहता है तो इससे आने वाले कई वर्षों तक अमेरिका में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक असमानता को दूर करने में मदद मिलेगी। अन्यथा न केवल अमेरिका बल्कि हम सभी को उथलपुथल भरे दशक के लिए तैयार होना होगा।

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