October 20, 2020

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मथुरा-काशी के मंदिर मुक्ति का आंदोलन संघ नहीं शुरू करेगा : मोहन भागवत

संघ स्वयं कोई आंदोलन शुरू नहीं करता, समाज की आवश्यकता को समझकर उसमें शामिल होता है

भारतीय स्वभाव से हिन्दू है, इसका पूजा पद्धिति से कोई लेना देना नहीं

चीनी चुनौती का जवाब है आत्मनिर्भरता

नई दिल्ली:- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के बारे में कहा कि संघ अपनी ओर से कोई आंदोलन शुरू करना संघ के एजेंडे में नहीं रहता। उन्होंने कहा कि इन धर्मस्थानों के बारे में हिन्दू समाज क्या फैसला करता है, यह भविष्य की बात है। संघ प्रमुख ने एक साप्ताहिक पत्रिका विवेक को दिए साक्षात्कार में साफ तौर पर कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन भी संघ ने शुरू नहीं किया था। डॉ भागवत ने कहा कि भारत का एक स्वभाव है और इस स्वभाव को ही हम हिंदू कहते हैं और इसका पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। साथ ही राष्ट्रीयता का भी पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि इसी आधार पर भारतीय मुसलमान हिंदू है वह अरबी या तुर्की नहीं है। हम भारतीय हैं और इसका हमें विचार करना पड़ेगा। सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने कहा है कि समय-समय पर कट्टरता का वातावरण पैदा होता है जिससे समाज को भटकना नहीं चाहिए भारत एक सनातन राष्ट्र है और हमारी पूजा पद्धति कोई भी हो हम इसका अंग हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान इतिहास के हर मोड़ पर एक साथ खड़े थे। भारत एवं भारत की संस्कृति के प्रति, व्यक्ति और पूर्वजों के प्रति गौरव के चलते सभी भेद मिट जाते हैं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों का निजी स्वार्थ होता है वह बार-बार अलगाव और कट्टरता फैलाने की कोशिश करते हैं। वास्तव में भारत ही एकमात्र देश है जहां सब लोग बहुत समय से एक साथ रहते हैं। अयोध्या आंदोलन की पृष्ठभूमि बताते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार अशोक सिंघल के विश्व हिन्दू परिषद में जाने के पहले से ही अयोध्या के धर्मस्थल को लेकर अभियान चल रहा था। बाद में इस अभियान के साथ विश्व हिन्दू परिषद जुड़ा। अयोध्या आंदोलन के बारे में भागवत ने कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में हम इस आंदोलन से जुड़े। संघ समाज में संस्कार विकास के काम में लगा है और वह लोगों के ह्रदय परिवर्तन के लिए सक्रिय है। राम मंदिर निर्माण संबंधी प्रश्न के उत्तर में मोहन भागवत ने कहा कि राम का मंदिर केवल पूजा पाठ के लिए नहीं बन रहा है। हमारे राम का मंदिर तोड़कर हमें अपमानित किया गया। हमारे जीवन मूल्यों और आचरण को नकारा गया। अब हमें भव्य मंदिर बनाकर उन्हीं मूल्यों और आचरण को दोबारा जीवित करना है। राम मंदिर का निर्माण होने तक प्रत्येक व्यक्ति के अंदर अयोध्या का निर्माण होना चाहिए जहां उनके आदर्श राम विराजित हैं। अपने साक्षात्कार में डॉ भागवत ने हिन्दू धर्मग्रथों और स्मृतियों में देशकाल परिस्थिति के अनुरूप बदलाव किए जाने का समर्थन करते हुए कहा कि इसका दायित्व देश के धर्माचार्यों पर है और उन्हें आगे आकर इनमें उचित बदलाव करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ग्रंथों पर नहीं चलता है, कालबाह्य हो चुकी बातों को समाज छोड़कर आगे चल रहा है। सरसंघचालक ने कहा कि देश में महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए उनको सक्षम और सशक्त बनाना होगा। वर्तमान में भारतीय समाज में यह धारणा है कि महिलाओं को घर परिवार की ही जिम्मेदारी उठानी चाहिए। चाहे वह किसी अन्य जिम्मेदारी को भी उठा रही हों उन्हें घर-परिवार की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें यह सोच बदलनी होगी और महिलाओं को घर परिवार की जिम्मेदारी से राहत देते हुए उन्हें उनकी स्वतंत्रता देनी होगी। उन्होंने कहा कि ‘बराबरी का सहभाग और बराबर की तैयारी’ महिलाओं के बारे में स्थाई विचार होनी चाहिए। चीन को वर्तमान की चुनौती बताते हुए भागवत ने कहा कि समाज जब भी आत्मनिर्भर होता है, तो वह अपनी आंतरिक शक्ति के कारण होता है। उसे लगता है कि चुनौतियां हमारे देश को झुका नहीं सकती। वर्तमान में देश में लोगों के अंदर ऐसी भावना है और इसके साथ दुनिया के अन्य देशों में जारी श्रेष्ठतम पद्धतियों अपनाकर हमें देश को आत्मनिरर्भता की ओर ले जाना चाहिए।

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