October 30, 2020

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डिजिटल के प्रयोग में सतर्कता अनिवार्य : एसपी

किशनगंज:- कोरोना-काल के इस दौर में डिजिटल पेमेंट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है और इसी के साथ बढ़ते जा रहे हैं फिशिंग के मामले। यानी डिजिटल डेटा चुराकर उससे ठगी। इन दिनों साइबर ठगी के मामलों में 500 फीसदी बढ़ोतरी हो चुकी है। ऐसे में कहीं आप भी इसके शिकार न हो जाएं, इसके लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी है।
शनिवार को जिला पुलिस अधीक्षक कुमार आशीष ने किशनगंज जिलावाशियों को इसे लेकर सावधान किया है। उन्होंने साइबर ठगी और इससे कैसे बचा जा सकता है इस विन्द पर कई सुझाव दिये है।देश के किसी भी हिस्से से फ्रॉड या ठगी करने वालों से आपकी सावधानानियां आपको सुरक्षा दे सकती हैं।
एस पी आशीष ने कहा कि इसके लिये निम्न बिन्दुओं पर ध्यान रखने की जरूरत है।
इस तरह की ठगी करने वाले लोग बैंक अधिकारी बन कर ऐसे काल कॉल करते हैं जिससे कोई संदेह पैदा न हो। वे वन टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी, क्रेडिट या डेबिट कार्ड नंबर, सीवीवी नबर, एक्सपायरी डेट, सिक्योर पासवर्ड, इंटरनेट बैंकिंग, एटीएम पिन, लॉग इन आइडी और पासवर्ड जैसी बातें चतुराई से जान लेते हैं।
उदाहरण के तौर पर कोई बड़ी लाटरी जीतना, कौन बनेगा करोडपति जैसे सीरियल से कॉल आना, अपने अकाउंट को दोबारा एक्टिवेट करना, एटीएम या क्रेडिट कार्ड बंद हो जाना, रिवार्ड प्वाइंट को रीडीम करना, अकाउंट को आधार से जोड़ना जैसी बेहद जरूरी बातें बताते हैं।
• फिर हासिल ब्योरे का इस्तेमाल ऑनलाइन ट्रांजेक्शन में कर लेते हैं।
• प्राप्त रकम को ई-वैलेट के जरिए देशभर में अपने नेटवर्क में बांट लेते हैं। ये ई-वैलेट फर्जी सूचनाओं के जरिए हासिल मोबाइल नंबर पर होते हैं।
फिशिंग के धंधे में मूलतः बेरोजगारों का इस्तेमाल होता है। बड़ी तादाद में मोबाइल सिम खरीदे जाते हैं, इस्तेमाल होते हैं और फिर नष्ट भी कर दिए जाते हैं। दो से लेकर पांच लड़के तक का समूह होता है। ये समूह अलग-अलग काम करते हैं। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा सहित स्थानीय भाषाओँ में भी ये अपने शिकार फंसाते हैं। आवाज़ बदलकर कॉल की जाती है। लड़की की आवाज़ का भी इस्तेमाल होता है। इस तरह अनजान लोगों को कॉल कर धोखा देना इस धंधे का बुनियादी सिद्धांत है। उनसे जरूरी ब्योरा लेकर उनके ही अकाउंट में सेंधमारी करना इसका क्रियाकलाप है। इसमें शामिल अपराधियों को गिरफ्तार करना आसान नहीं होता है। पर्याप्त सबूत के अभाव में पकड़ना और सज़ा दिलाना, दोनों काफी मुश्किल होता है।

ऑनलाइन ठगी से बचने के लिए क्या करें

• पहली बात यह है कि कभी कोई सूचना फोन पर किसी को साझा न करें। दुनिया में कोई चीज़ किसी को मुफ्त में नहीं मिलती, और अगर कोई ऐसा कह रहा है तो उसकी मंशा निहायत ही गलत है।
• अपने पिन नम्बर को कुछ अन्तराल पर बदलते रहें (६० दिन में), पिन हमेशा गुप्त रखें, किसी को ना बताएं।
• हमेशा रेपुटेड ऑनलाइन वॉलेट के जरिये ऑनलाइन खरीददारी करें। संदिग्ध वॉलेट या मुफ्त की चीज़ें ऑफर करने वाले साइट्स ज्यादातर फ्रॉड का कारोबार ही करते हैं।
• ओटीपी, सीवीवी नंबर जैसी गोपनीय जानकारी तो किसी भी सूरत में साझा करने से बचें। कोई भी बैंक या वॉलेट ऐसे नंबर नहीं पूछते हैं।
• बिना जांचे-परखे, कोई मोबाइल ऐप डाउनलोड न करें, ये आपकी बैंकिंग से जुडी जानकारी लीक कर सकता है या , मोबाइल क्लोनिंग करके फ्रॉड भी कर सकता है।
• मुफ्त के, अनजाने या ज्यादा पब्लिक से जुड़े वाई फाई या ब्लूटूथ नेटवर्क से अपने मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि का कनेक्शन ना जोड़ें. ये हानिप्रद सिद्ध हो सकता है।
• अच्छी क्वालिटी के एंटी-वायरस / फ़ायरवॉल का प्रयोग करें।
• इ-मेल या सोशल मीडिया पर बैंक या अन्य जगहों से भेजे गए लुभावने मेल या लिंक को क्लिक ना करें.
• संदिग्ध कॉल आते ही उसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दें।
• ऐसा लगता है कि कोई सूचना साझा हो चुकी है तो तुरंत साइबर सेल या अपने नजदीकी पुलिस थाने को सूचित करें।
• अपने मोबाइल ऑपरेटर या कस्टमर केयर से भी तुरंत संपर्क करें।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें। जानकारी भी बचाव है।

उल्लेखनीय है कि साइबर क्राइम का बढ़ता खतरा भारत में साइबर क्राइम 2019 की अंतिम तिमाही के मुकाबले 2020 की पहली तिमाही में 37 फीसदी बढ़ चुका है। कास्पर स्काई सिक्योरिटी नेटवर्क का दावा है कि उसने इस साल जनवरी से मार्च के दौरान 5 करोड़ 28 लाख 20 हजार 874 स्थानीय साइबर ख़तरों को रोका और उन्हें ब्लॉक किया। पिछले साल की अंतिम तिमाही में यही संख्या 4 करोड़ 7 लाख 57 थी। वेब थ्रेट के मामले में भारत दुनिया में 27वें नंबर पर है। बीते साल अंतिम तिमाही में भारत की रैंकिंग 32 वें नंबर पर थी।
संवाददाता सुबोध

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