October 23, 2020

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जमींदारी प्रथा उन्मूलन के सूत्रधार पूर्व मुख्यमंत्री के.बी. सहाय ने पूरे देश को दी नयी दिशा

जमींदारों के खिलाफ लड़ाई में हुए अकेले, कई बार जानलेवा हमले में बाल-बाल बचे

रांची:- बिहार में 1963 से 1967 तक मुख्यमंत्री रहे कृष्ण वल्लभ सहाय (केबी सहाय) आजादी के बाद देश में जमींदारी प्रथा उन्मूलन के सूत्रधार रहे। जमींदारों के खिलाफ वर्षाें तक चली लड़ाई में वे प्रायः अकेले रहे, कई बार उनपर जानलेना हमला भी हुआ, पर वे बाल-बाल बच गये, अंततः 2 जून 1974 को कार दुर्घटना में पटना से हजारीबाग लौटने के क्रम में उनकी हुई मौत आज भी रहस्य बना हुआ है।
बिहार एक्ट 1950 से जमींदारों में मचा हड़कंप
आजादी की लड़ाई में लंबे समय तक सक्रिय भागीदारी निभाने वाले केबी सहाय 1924 में पहली बार बिहार विधान परिषद के सदस्य बने थे। 1937 में वह कांग्रेस सरकार के तब संसदीय सचिव बने, जब डाॅ. श्रीकृष्ण सिंह के हाथों में सरकार की बागडोर थी। 1946 से लेकर 1957 तक वह श्रीबाबू की सरकार में राजस्व मंत्री के रूप में काफी चर्चित रहे। अंतरिम सरकार में राजस्व मंत्री की हैसियत से के.बी.सहाय ने जमींदारी प्रथा उन्मूलन के लिए कानून बनाया। इस कानून को बिहार एक्ट 1950 के नाम से जाना जाता है। इस कानून ने पूरे बिहार के जमींदारों में हड़कंच मचा दिया। दरभंगा राज के डाॅ. कामेश्वर सिंह के नेतृत्व में सभी जमींदारों ने इस कानून को चुनौदी हाईकोर्ट में दी। दायर याचिका में इस कानून को संविधा के अनुच्छेद 14 के विरूद्ध बताया गया। इसके बावजूद देश में बिहार पहला राज्य था, जिसने जमींदारी प्रथा खत्म करने की पहल की थी। लेकिन पटना हाईकोर्ट ने और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कानून को निरस्त कर दिया। कानून के इस हश्र से हतप्रभ पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा संविधान में पहला संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत अनुच्छेद 14 को निश्तेज करने के लिए संविधान में 31 (ए) और 31 (बी) जोड़ा गया। 1955 में भू हदबंदी विधेयक पेश किया गया और इसे संशोधित रूप में 1959 में स्वीकार किया गया। 1962 इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।
सभी राजघराने व जमींदार विरोध में खड़े हुए
जमींदारी प्रथा उन्मूलन में के.बी. सहाय की भूमिका देखते हुए बिहार के सभी राजघराने और जमींदार परिवार के सदस्य के.बी. सहाय की राजनीति को समाप्त करने में जुट गये। विधानसभा और संसद के पहले चुनाव में जब के.बी सहाय ने बड़कागांव विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए पर्चा भरा, तो रामगढ़ राजा कामख्या नारायण सिंह खुद उन्हें हराने के लिए चुनाव मैदान में उतर गये। राजा रामगढ़ की ओर से चुनाव प्रचार के लिए जो वीडियो फिल्म दिखायी जा रही थी,उसमें भारी भीड़ की उपस्थिति को कांग्रेस ने फर्जी करार दिया और कांग्रेस पार्टी की शिकायत पर जिला प्रशासन ने फिल्म दिखाने वाली मशीन जब्त कर ली थी। कांग्रेस का आरोप था कि भीड़ का हिस्सा पंडित नेहरू की सभा होता और भाषण कर रहे होते राजा रामगढ़। फिल्म में रामगढ़ नरेश को गरीबों के बीच मुफ्त अनाज बांटते हुए भी दिखाया जा रहा था, जबकि कांग्रेस का आरोप था कि वह अकाल की भयावह स्थिति में भी अपने महतों में सुरक्षित आराम फरमा रहे थे।
बड़कागांव से मिली हार, गिरिडीह ने बचायी इज्जत
केबी सहाय के पक्ष में पंडित नेहरू भी सभा करने आये, लेकिन चुनाव परिणाम आया, तो पता चला कि केबी सहाय बड़कागांव से चुनाव हार गये। मगर उनकी इज्जत बचा ली गिरिडीह ने, जहां से वह दो हजार से अधिक मतों से चुनाव जीतकर विधानसभा में दाखिल हुए। हालांकि 1957 के चुनाव में कामाख्या नारायण सिंह ने उन्हें गिरिडीह से भी पराजित कर दिया।
कामराज प्लान में मुख्यमंत्री बनने का मिला मौका
1962 के विधानसभा चुनाव में केबी सहाय ने बड़कागांव से अपना नामांकन वापस ले लिया पटना पश्चिमी सिंह से उम्मीदवारी का पर्चा भरा और वे वहां से चुनाव जीत भी गये। चुनाव जीतने के बाद वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे, लेकिन विनोदानंद झा मुख्यमंत्री बने। प्रारंभ में विनोदानंद झा ने उन्हें मंत्रिमंडल में भी शामिल नहीं किया, लेकिन इसी दौरान लाल बहादुर शास्त्री के प्लान के तहत मंत्रिमंडल में सभी गुटों को स्थान देने का प्रस्ताव आया और केबी सहाय को विनोदानंद झा मंत्रिमंडल में स्थान मिला। इस बीच 24 अगस्त 1963 को कामराज योजना के धमाकेदार प्रस्ताव में विनोदानंद झा को इस्तीफा दे देना पड़ा और केबी सहाय मुख्यमंत्री बने।

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