October 25, 2020

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सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम मामले पर 21 सितम्बर को होगी सुनवाई

नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट सिविल सर्विसेज में मुस्लिम समुदाय के कथित घुसपैठ को लेकर प्रसारित होने वाले सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम के मामले पर 21 सितंबर को भी सुनवाई जारी रखेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी को नया हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी। हलफनामा में चैनल बताएगा कि कार्यक्रम में वह किस तरह का बदलाव करेगा। सुनवाई शुरू होते ही वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ज़कात फाउंडेशन की तरफ से सुनवाई से जुड़े और कोर्ट से कहा कि हम पक्षकार नहीं हैं। लेकिन मसला हमसे जुड़ा हुआ है। हम हलफनामा दाखिल करना चाहते हैं। तब कोर्ट ने कहा कि आप पक्ष रखने के लिए अर्ज़ी दे सकते हैं। लेकिन सुनवाई सिर्फ कार्यक्रम के प्रसारण पर है। हम आपके ऊपर लगे आरोप की जांच नहीं कर रहे हैं। तब हेगड़े ने कहा कि ज़कात फाउंडेशन सबकी मदद करता है। कई गैर मुस्लिम छात्रों की भी मदद की है। तब कोर्ट ने कहा कि आपने तो जिरह शुरू कर दी। पहले मामले के पक्षों को तो बोलने दें। अगर आपको कुछ कहना है तो अर्ज़ी दाखिल कीजिए। सुदर्शन टीवी की ओर से वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि संपादक बतौर पत्रकार अपने कर्तव्य जानते हैं। वे बिना तथ्य खबर नहीं दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि चैनल किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है। देशहित में खोजी पत्रकारिता की है। चार एपिसोड के बाद प्रसारण रोक देना सही नहीं था। अगर हमने वाकई कुछ गलत किया तो परिणाम भोगने को तैयार हैं। श्याम दीवान ने कहा कि हम किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति के सिविल सर्विस में चयन के खिलाफ नहीं हैं। हमारी खबर भारत के लिए शत्रुता का भाव रखने वाले संगठनों की यूपीएससी में दिलचस्पी पर है। हमने ज़कात फाउंडेशन के संस्थापक ज़फ़र महमूद से खबर चलाने से पहले प्रतिक्रिया मांगी लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। श्याम दीवान ने कहा कि दस साल में ज़कात फाउंडेशन की मदद से 119 लोग यूपीएससी में चुने गए। लंदन में भारतीय उच्चायोग पर हमला करवाने वाले मदीना ट्रस्ट ने भी उसे फंड दिया। अनुदान देने वालों में मुस्लिम एड जैसे कई संगठन, जिनके आईएसआई और आतंकवादी संगठनों से संबंध हैं। क्या इसे लोगों के सामने न रखा जाए। उन्होंने कहा कि इमरान प्रतपगढ़ी ने भाषण दिया कि मुसलमान यूपीएससी पर कब्ज़ा करें। अल्पसंख्यकों की सरकारी योजना का लाभ लेने वाले मुस्लिम, ओबीसी यूपीएससी में आयु सीमा का भी लाभ ले रहे हैं। ज़कात फाउंडेशन भारत विरोधी संगठनों से फंड लेता है। ये बातें तथ्य हैं। क्या इन्हें कहने से रोका जा सकता है। श्याम दीवान ने कोर्ट से आग्रह किया कि रोक हटा कर बचे हुए एपिसोड का प्रसारण होने दिया जाए। कोर्ट ने श्याम दीवान से कहा कि आपने मुसलमानों की यूपीएससी में बढ़ती संख्या की बात करते हुए उन्हें टोपी दाढ़ी में दिखाया। बैकग्राउंड में आग की लपटें दिखाईं। अकबरुद्दीन ओवैसी के लिए नमकहराम लिखा। ओवैसी और प्रतापगढ़ी को दिखाते समय भी आग की लपटों के साथ दिखाया। कार्यक्रम को टुकड़ों की बजाय पूरा देखा जाए। सभी एपिसोड का प्रसारण होने दें। हम कहीं भाग नहीं रहे। चीन सीमा पर हमारे सैनिक बहुत कुछ झेल रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने चीन की तरफ से भारत के बड़े लोगों की जासूसी की खबर की। क्या इसे एक समुदाय पर हमला कहा जाएगा। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि आग की लपटें हटनी चाहिए। जालीदार टोपी में हरी टी शर्ट पहने व्यक्ति को पांच सौ करोड़ के टैग के साथ दिखाया जा रहा है। यह हटना चाहिए। श्याम दीवान ने कहा कि हम आपकी चिंताओं को दूर करने की पूरी कोशिश करेंगे। तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आप हलफनामा दायर कर बताएं कि आप क्या करने जा रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि गलत खबर दिखाने वालों पर 30 दिन की पांबदी लगाने जैसे प्रावधान किए जा सकते हैं। इस दिशा में काम हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि एनबीएसए के ज़रिए चैनल खुद पर नियंत्रण की बात करते हैं। लेकिन वहां अधिकतम एक लाख रुपये का जुर्माना लगता है। क्या यह काफी है, सुदर्शन चैनल तो इस संस्था का सदस्य भी नहीं है। जस्टिस केएम जोसफ ने कहा कि जैन, ईसाई संगठन भी अपने समुदाय के छात्रों की मदद करते हैं। हर कोई मुख्य धारा में आना चाहता है। आप क्यों रोकना चाहते हैं। आपके कार्यक्रम में उदित राज ने मुसलमानों के सिविल सर्विस में आने की पैरवी की, उन्हें बोलने नहीं दिया गया। तब श्याम दीवान ने कहा कि हम नया हलफनामा दाखिल करेंगे। उसके बाद कोर्ट ने सुदर्शन टीवी को नया हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी। चैनल बताएगा कि कार्यक्रम में वह किस तरह का बदलाव करेगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील शादान फरासत ने आगाह करते हुए कहा कि चैनल ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय को भी आश्वासन दिया था कि प्रोग्राम कोड का पालन किया जाएगा, लेकिन उसका सौ बार उल्लंघन किया गया। एनबीए की ओर से वकील निशा भांभानी ने कहा कि वो दंतहीन संगठन नहीं है। वे चैनलों से प्राईम टाइम में माफी तक मंगवाते हैं। तब जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि क्या आप टीवी देखती हैं। तब भांभानी ने कहा कि हां। तब जस्टिस चंद्रचूड ने पूछा कि क्या आप कंट्रोल कर सकती हैं। तब भांभानी ने कहा कि नहीं, लेकिन हमने उसमें काफी सुधार किया है। सभी चैनल्स हमारे संगठन के सदस्य नहीं हैं। तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आप एनबीए को मजबूत कीजिए ताकि आप ज्यादा रेगुलेट कर सकें। अगर आपकी संख्या कम होगी तो आपका रेगुलेशन लागू नहीं हो पाएगा। आप हमें ये बताइए कि एनबीए मजबूत कैसे होगा। जस्टिस केएम जोसेफ ने पिछले 17 सितंबर को सुनवाई के दौरान श्याम दीवान से पूछा था कि आपका मुवक्किल कौन है। केबल आपरेटर या ब्राडकास्टर। उन्होंने कहा था कि चैनल एयर वेब का इस्तेमाल करते हैं जो कि सार्वजनिक संपत्ति है। इसलिए उन्हें धारा 19(2) का पालन करना होगा। सुनवाई के दौरान प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से वरिष्ठ वकील प्रीतेश कपूर ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का समर्थन किया। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को रेगुलेट करने के लिए नई गाइडलाइन बनाये जाने के सुप्रीम कोर्ट के रूख से सहमत नहीं है। केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि टीवी मीडिया कंटेंट को लेकर पहले से नियम तय किए गए हैं। शिकायतों के निवारण के लिए नियामक संस्थाएं हैं। हरेक केस में तथ्यों के आधार पर फैसला लिया जाता है। केन्द्र ने कहा है कि अगर कोर्ट फिर भी मीडिया कंटेंट को लेकर गाइडलाइंस बनाना चाहता है तो सबसे पहले नियम डिजिटल मीडिया के लिए बनाने जाने की ज़रूरत है जिसकी पहुँच अपने दर्शकों या पाठकों तक सोशल मीडिया के दौर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा है।सुदर्शन टीवी ने अपने हलफनामे में कहा है कि वो खोजी पत्रकारिता कर रही है। कोर्ट ने पिछले 15 सितंबर को सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम पर गहरा एतराज जताया था। कोर्ट ने अगले आदेश तक इस कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दिया था। कोर्ट ने कहा था कि मीडिया की स्वतंत्रता बेलगाम नहीं हो सकती, इसके लिए कुछ नियम बनाए जाने जरुरी हैं। कोर्ट ने कहा था कि देश के सुप्रीम कोर्ट होने के नाते हम यह कहने की इजाजत नहीं दे सकते हैं कि मुस्लिम सिविल सर्विसेज में घुसपैठ कर रहे हैं। आप ये नहीं कह सकते हैं कि पत्रकारों को ये करने की असीम शक्ति है। कोर्ट ने कहा था कि किसी विदेशी संगठन की कथित साजिश पर खबर चलाना अलग बात है, लेकिन पूरे समुदाय को साजिश में शामिल कैसे कह सकते हैं। कोर्ट ने इस कार्यक्रम को पहली नजर में विषैला और समाज में बंटवारा करने वाला कहा था। चैनल के वकील ने इसे खोजपरक पत्रकारिता बताया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि यूपीएससी की परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। क्या इससे ज्यादा आपत्तिजनक कुछ हो सकता है। जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा था कि मीडिया को उतनी ही आजादी हासिल है जितनी देश के दूसरे नागरिकों को। मीडिया की आजादी बेलगाम नहीं हो सकती है। आप टीवी डिबेट का तरीका देखिए। एंकर उन गेस्ट को म्युट कर देते हैं जिनकी राय उनसे अलग होती है, सिर्फ एंकर ही बोलते रहते हैं।

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