October 26, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

इतिहास की वीथियों में बच्चू बाबू : पंकज जीत सिंह

मनातू,पलामू:- मेरे दादा मौआर जगदीश्वर जीत सिंह उर्फ बच्चू बाबू का जन्म 1 नवम्बर सन 1928 ई. को मनातू गढ़ में हुआ था। पिता का नाम मौआर बिक्रमा जीत सिंह(लल्लू बाबू) और माता का नाम गुलबदन मौआर था। मनातू रियासत के राजा राय बहादुर मौआर प्रयाग जीत सिंह के इकलौते पौत्र थे। जिनकी जमींदारी की सीमा चौदह कोस थी।
आप एक निष्णात ज्योतिष भी थे। यद्यपि विद्यालयी शिक्षा न्यून थी फिर भी अंग्रेजी सहित विभिन्न भाषाओं का शास्त्र ज्ञान उतना ही उत्तम।
अखबारों ने उन्हें “मनातू के आदमखोर” की संज्ञा प्रदान की। जिसका प्रतिकार उन्होने कभी नही किया। वो कहते कि एक दिन ये अखबार वाले बोलते-बोलते थक कर खुद चुप हो जाएंगे। तत्कालीन बिहार सरकार ने उनपर बंधुआ मजदूरी अधिनियम के तहत 96 मुकदमों के साथ साथ अंडा चोरी से लेकर हत्या और राहजनी तक के सैकड़ो मुकदमे दर्ज किए और माननीय उच्चतम न्यायालय ने मुकदमों को खारिज कर दिया एवं कुछ में विजय प्राप्त हई।

आपको विदेशी गाड़ियों का भी बहुत शौक था। कुछ गाड़ियां बेंटले,क्रेस्लर, प्लायमाउथ, डीसेटो, मरकरी फोर्ड आदि पिता एवं दादा से विरासत के तौर पर प्राप्त हुई। ऑस्टिन, सेवरले,हडसन एक मिलिट्री जीप (जिसपर वे शिकार करते थे) का क्रय उन्होंने स्वयं किया था। उनके श्वसुर बाबू केदारनाथ सिह जिनकी कोडरमा में अबरख की खानें थीं, ने एक गाड़ी सुपर ब्युक-8 दहेज में दिया था। जिसे वे बड़े शौक से चलाते थे। निशानी के तौर पर एक गाड़ी सेवरले ब्लेयर आज भी हमारे गैराज में मौजूद है। पशु पक्षियों और जंगली जानवरों को पालने का अद्भुत शौक था। एक चीता सहित विभिन्न नस्ल ले कुत्ते, चिड़िया आदि अपने गढ़ में उन्होंने पाला था।अपनी सवारी के लिये गाड़ियों के अतिरिक्त चौदह घोड़े और दो हाथी पाल रखा था।
वैसे तो उनके स्वयं के नाम अनुज्ञापित 17 विदेशी बंदूकें थीं जो वर्तमान में पलामू जिला शस्त्रागार में जमा है लेकिन उनकी पसंदीदा रायफल 450/400 बोर डबल बैरल और हॉलिस स्पेशल 12 बोर की बन्दूक सहित वेबली एंड सकॉट का रिवाल्वर था। मैने स्वयं उनको बाघ, हिरण और कितने जंगली जानवरों का आखेट करते देखा। निशाना ऐसा जो कतई लक्ष्य से इतर न हो। जंगली जानवरों का शिकार करने वाले इस शिकारी को कभी अपने हाथों किसी आदमी को एक थप्पड़ मारते हुए नही देखा। लेकिन बड़े-बड़े अख़बारनवीशों ने आदमखोर तक कह डाला जो पलामू के तत्कालीन राजनीति से प्रेरित थी। बिहार के दो राजनीतिक घरानों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का परिणाम था।
पश्चिम बंगाल की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी के उपन्यास “भूख” के कथानक में वे प्रकारांतर से दिखाई पड़ते हैं तो वही मदन मोहन पाठक की कृति “गगन घटाघह रानी” के वो रायबहादुर हैं। प्रसिद्ध पत्रकार पी साईंनाथ ने अपनी पुस्तक “Indian drought” में Man eater of Manatu” शीर्षक से आपको उभारा है। राकेश कुमार सिंह के उपन्यास “महाअरण्य में गिद्ध” में भी आप उपस्थित हैं। “The man eater of Manatu” के नाम से एक वृतचित्र बी बी सी ने बनाया। जिसे जनता सरकार में प्रतिबंधित कर दिया गया। काल प्रवाह के साथ-साथ विभिन्न अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं ने उनके दर्द,उनकी सम्वेदना को भी स्थान देने का प्रयास भी किया। जिनके प्रति मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। समय का तकाजा है कि उस सख्शियत का इतिहास उचित मूल्यांकन करे।
पलामू का वीर, बहादुर योद्धा, मनातू का वह रत्न, 5 सितम्बर 2020 को जब रात्रि का अवसान हो रहा था, नवीन सूर्य का उदय होने वाला था, अपनी चिरनिंद्रा में निमग्न
हो गया। अस्तु, हमारे बीच शारीरिक उपस्थिति नही है तथापि स्मृतियो के आंगन में उसके स्नेह का प्रेमपुष्प पुष्पित और पल्लवित है और मनप्राण सदैव आप्लावित होता रहेगा।
आज उनके श्राद्ध कार्यक्रम का अंतिम दिन है, पगड़ी रस्म पूरी हुई। दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना हेतु जन सैलाब उमड़ पड़ा है।
मैं स्वयं को इस योग्य नही समझता की श्रद्धांजलि अर्पित कर सकूं। उनके निर्दिष्ट मार्ग पर चलते-चलते उनके नाम, उनकी प्रतिष्ठा, उनकी ख्याति को यथावत रखने का प्रयास ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।यद्यपि दरख़्त कितने भी ऊंचे क्यों न हो जाएं आसमान की बुलंदियों को नहीं छू सकते।
सादर नमन।

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