October 25, 2020

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नेहरू की नहीं, जिन्ना की जिद की वजह से दो टुकड़ों में विभाजित हुआ भारत

स्वीडिश राजनीति विज्ञानी इश्तियाक अहमद ने अपनी किताब में किया दावा

इस्लामाबाद:- ब्रिटिश शासन से आजादी से पहले भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर कई तर्क दिए जाते हैं। यहां तक कहा जाता है कि पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू किसी भी कीमत पर भारत में बनने वाली सरकार का नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाहते थे। हालांकि, पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश राजनीति विज्ञानी इश्तियाक अहमद ने अपनी पुस्तक में इससे ठीक उलटा दावा किया है।
इश्तियाक अहमद ने अपनी आने वाली किताब में दावा किया है कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा करने के पीछे मोहम्मद अली जिन्ना की जिद थी। इश्तियाक ने अपनी किताब जिन्ना : हिज सक्सेजेज, फेल्योर्स एंड रोल इन हिस्ट्री में कहा है कि महात्मा गांधी और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने भारत को एकजुट रखने की बहुत कोशिश की लेकिन पाकिस्तान के कायदे-आजम जिन्ना बंटवारे पर अड़े थे। इश्तियाक का कहना है जिन्ना ने कांग्रेस को हिंदू पार्टी और गांधी को ‘हिंदू और तानाशाह’ करार देने के लिए हमले का कोई मौका नहीं गंवाया।
इश्तियाक ने कहा मैंने दिखाया है कि जिन्ना ने जब 22 मार्च, 1940 में लाहौर में अपना प्रेसीडेंशियल संबोधन दिया और फिर 23 मार्च को रेजॉलूशन पास कराया, उसके बाद जिन्ना या मुस्लिम लीग ने एक बार भी संयुक्त भारत को स्वीकार करने की इच्छा जाहिर नहीं की जबकि फेडरल सिस्टम ढीला था और ज्यादातर ताकतें प्रांतों में थीं। इश्तियाक के दावे के बाद पाकिस्तानी-अमेरिकी इतिहासकार प्रो. आएशा जलाल की थ्योरी को चुनौती मिल रही है।
फ्रो जलाल की ध्योरी के आधार पर 1980 से यह माना जाता रहा है कि जिन्ना ने कांग्रेस के साथ पावर-शेयरिंग समझौते के लिए अपनी भूमिका निभाई थी। इश्तियाक ने इसके उलट दावा किया है, जिन्ना के ऐसे अनहगिनत भाषण, बयान और संदेश हैं जिनमें वह पाकिस्तान बनाने के लिए भारत के बंटवारे की बात कर रहे हैं। उन्होंने इस बात को भी सही बताया है कि ब्रिटेन बंटवारे के लिए इसलिए तैयार हुआ क्योंकि उसे पता था कि कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त भारत ब्रिटेन के एजेंडा को पूरा नहीं करेगा, लेकिन मुस्लिम लीग के नेतृत्व में पाकिस्तान से उसे फायदा होगा। इश्तियाक ने ट्रांसफर ऑफ पावर डाक्युमेंट्स जैसे प्राइमरी स्रोतों के आधार पर दावा किया है कि ब्रिटेन को डर था कि भारत सोवियत यूनियन के साथ खड़ा हो जाएगा।

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