October 30, 2020

अनावरण न्यूज़

एक नयी सुबह का

क्यों कहूँ मैं आदमखोर : अनुनिता

पटना:- जीवन चूक जाता है,वक्त रीत जाता है पर यादें इंसान को जीवित रखती हैं। मौआर जगदीश्वरजीत सिंह की मृत्यु निश्चय ही एक युग का अवसान है। पलामू का यह शेर जब जीवित था तब भी सुर्खियों में था और अब मौत के आगोश में है, तब भी सुर्खियों में है। अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुके थे मनातू के मौआर। अविभाजित बिहार के दक्षिणी छोटानागपुर का पूरा इलाका इन्हें ‘मौआर साहब’ बोलता है। हालांकि अब झारखंड का हिस्सा है यह।
मेरा बचपन अपने ननिहाल यानि मनातू के आदमखोर जमींदार के आँगन में बीता है। मेरी माँ राजमणि नीलम इनकी प्रिय संतान थीं। वैसे तो सभी बच्चे माँ बाप को प्रिय ही होते हैं। बचपन से सुनते रही,सयानी हुई तो पापा की बुक्शेल्फ में इस आदमखोर को किताबों में कैद देखा,कई पत्र पत्रिकाओं की सुर्खियों में देखा तो अखबार की अनेक कतरनों में सिमटा देखा।
बीबीसी लंदन ने इनके ऊपर एक डॉकउमेन्टरी बनाई थी जिसे लोगों तक पहुँचने नहीं दिया गया। संडे मैगजीन में छपी खबर ने तो इन्हें आदमखोर से विशेषित किया…..”मनातू का आदमखोर जमींदार” कहा गया। लोगों ने यह तक कह दिया कि मौआर साहब अपनी बात नहीं मानने पर लोगों को अपने पालतू बाघ के सामने फेंकवा देते हैं।
कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है,पर इतिहास गवाह है नाम के बिना आपका काम भी अधूरा रह जाता है। बच्चू बाबू यानि मौआर जगदीश्वरजीत सिंह अपने नाम से ही जाने गए। बंधुवा मजदूरी से लेकर तमाम तरह के आरोप इनपर लगाए गए,सैकड़ों मुकदमों से राज्य सरकार की फ़ाइलें अटी पड़ी रहा करती थीं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ज्यादातर मामले खारिज कर दिए। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इन्हें निर्दोष साबित कर दिया, पर ये ‘मौआर’ हमारे-आपके बीच आज भी दोषी खड़ा है। आखिर कब तक ये होता रहेगा। कोई तो इस दाग को मिटाए….. अपने कुर्ते पर पान के दाग की तरह अपने चरित्र पर भी दाग लिए ये मनातू के लोगों के आज भी ‘सरकार’ हैं। अपने जीवन में पान खाने और शिकार करने के क्रम में मारे जाने वाले जानवरों के अलावा मौआर साहब ने किसी को एक थप्पड़ तक नहीं मारा।
नब्बे का दशक था। हमारी बचपने की समझ थोड़ी और समझदार हो रही थी। लगभग बारह-पंद्रह सौ लोगों की आक्रामक भीड़ हाथ में मशाल लेकर गढ़ को चारों तरफ से घेरे हुई थी। “गढ़” बोलते हैं मौआर साहब के पुरखों की हवेली को,जिसमें मेरी याद से छोटे-बड़े मिलाकर लगभग एक सौ कमरे थे। गढ़ की दीवारें इतनी मजबूत थीं कि उसपर दो आदमी आराम से सो सकता था। वो गढ़ तो अब लगभग जमींदोज हो चुका है पर खैर,बात वही है- ‘यही एक बच गई है निशानी तेरे प्यार की’ । उस उबलती भीड़ पर फिर आते हैं हम। मनातू मौआर हाय – हाय,तुम्हारी जमीन हमारी है,हमारी है – के नारों से रात और भी डरावनी हो गई थी। मनातू थाना थोड़ी ही दूरी पर है लेकिन आईपीएफ समर्थकों के सामने पुलिस की लाचारी सर्वविदित है। मौआर साहब के पास लाइसेंसी कई हथियार थे,उन्होंने कई राउन्ड आसमान में फ़ाइरिंग की। उधर से भी अंधाधुंध गोलियां चलीं। कुछ देर के बाद नारेबाजी करते हुए भीड़ मनातू बाजार की तरफ बढ़ गई। ऐसी कई यादें हैं जो हमारे किशोरवय मन पर आघात लिए हुए आज भी हमारी उनिन्दि आँखों में कैद हैं।
अपनी शर्तों पर जीना इनका उसूल था और यही इनके जीवन की बानगी थी। लगभग पच्चीस-तीस साल पहले ये चाहते तो अपना पैतृक घर छोड़ कर पलामू जिला मुख्यालय डाल्टनगंज स्थित अपने आलीशान भवन में आकर रह सकते थे, परंतु इन्होंने ऐसा किया नहीं। बच्चों और घर के बाकी सदस्यों को मनातू से बाहर सुरक्षित स्थान पर भेज दिया, पर स्वयं जीवनपर्यंत वहीं रहे। एक सौ पैंसठ गाँव की जमींदारी थी इनकी। हालांकि ज्यादातर जमीन बांट दी गई। इन्होंने उफ़ तक नहीं की। ये समझते थे कि देश का कानून सर्वोपरि है। सभी को जीने का हक है। इन्होंने कभी किसी के हक़ को दबाया नहीं। हाँ,परिस्थितियाँ इंसान को हमेशा अपने अनुरूप काम करने को विवश करती हैं और इसी क्रम में हम आप सामाजिक समरसता से आंशिक दूर हो जाते हैं, पर इसका यह अर्थ कतई नहीं हो सकता कि किसी को “आदमखोर का तगमा” दे दिया जाए। यह निःसंदेह किसी के लिए भी पीड़ादायक हो सकता है।
बीसवीं सदी का अंतिम दशक इनके लिए अच्छा नहीं रहा। जमीन हड़प ली गईं,खेतों में आग लगा दिया जाता था। जहां अनाज आँगनों में ऐसे ही देखे जाते थे, वहाँ अब खाने के लिए चावल,गेंहू खरीदने होते थे। इनका जीवन नक्सलवाद की भेंट चढ़ चुका था.फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी। उस दौर में मौआर साहब कई कहानियों के पात्र बन कर उभरे। बंगाली काव्य की प्रमुख लेखिका महाश्वेता देवी ने “भूख” में इनके चरित्र को उकेरा,तो वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने अपनी किताब में इनको जगह दी। राकेश कुमार का उपन्यास “महाअरण्य में गिद्ध” में तो लगता है कि शीर्षक ही इन्हें समर्पित किया गया है। पलामू के ही मनमोहन पाठक ने “गगन घटा घहरानी” में इनका चरित्र चित्रण किया है। मुझे दुख है और अपार पीड़ा भी है कि समाज की सही समझ रखने वाले लोग क्यों नहीं उस इंसान के साथ खड़े हुए जिन्हें लोग आदमखोर कहते रहे और दूसरी तरफ मौआर जगदीश्वर जीत सिंह अपनी बटन जैसी चमकती दमकती आँखों के साथ,अपने बड़े से चेहरे पर गुदगुदाती हुई मुस्कान बिखेरते रहा करते थे। आज ‘मनातू का यह शेर’ चिर निद्रा में सो गया है, पर मौआर साहब कहानियों में जिंदा रहेंगे। आप हमारे जीवन में मार्गदर्शक बनकर आसमान में सूरज की तरह दमकते रहेंगे और वादा है आपसे-आपके परिवार की यह पीढ़ी आपको आदमखोर नहीं कहेगी।

लेखिका अनुनिता मौआर साहब की नातिन और महागुरु महादेव पत्रिका की संपादक हैं।

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